प्राचीन विश्व के सात अजूबों में वह भव्य मकबरा जो एक रानी के टूटे दिल से जन्मा, जिसे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ कलाकारों ने बनाया, और जिसने हमारी भाषा को “मकबरे” के लिए एक शब्द हमेशा के लिए दे दिया
चौथी सदी ईसा पूर्व का एक सुबह का दृश्य।
हालीकार्नासस नगर की पहाड़ियों से उतरते किसी यात्री की आँखें जब शहर पर पड़ती थीं तो वे सबसे पहले जो देखता था वह न किला था, न बंदरगाह, न बाज़ार।
वह देखता था एक विशाल श्वेत संगमरमरी संरचना जो शहर के बीचोबीच आकाश की ओर उठती थी। सूर्य की रोशनी में उसके हजारों स्तंभ और मूर्तियाँ चमकती थीं। उसके शीर्ष पर चार घोड़ों वाले रथ पर सवार दो विशाल आकृतियाँ थीं जो क्षितिज की ओर देख रही थीं।
यह था मौसोलस का मकबरा यानी “मॉसोलियम एट हालीकार्नासस” (Mausoleum at Halicarnassus)।
प्राचीन विश्व के सात अजूबों में से एक। एक पत्नी के अपने पति के प्रति असीम प्रेम का प्रतीक। उस काल के सर्वश्रेष्ठ चार मूर्तिकारों की कला का संगम। और वह इमारत जिसने “मॉसोलियम” यानी “मकबरा” शब्द को दुनिया की हर भाषा में हमेशा के लिए स्थापित कर दिया।
आज अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू, फ्रेंच, जर्मन सहित दर्जनों भाषाओं में जब भी हम किसी भव्य मकबरे को “मॉसोलियम” कहते हैं, तो हम अनजाने में उस एक शासक को श्रद्धांजलि दे रहे होते हैं जो 353 ईसा पूर्व में मरा था।
यह उसी असाधारण इमारत और उन असाधारण लोगों की कहानी है जिन्होंने इसे बनाया।
हालीकार्नासस: वह प्राचीन नगर जहाँ यह महान कहानी जन्मी
मौसोलस के मकबरे की कहानी शुरू होती है हालीकार्नासस (Halicarnassus) नगर से। यह नगर आज के तुर्की के बोदरुम (Bodrum) में स्थित है। यह एजियन सागर (Aegean Sea) के तट पर, आधुनिक इज़मिर से लगभग 175 किलोमीटर दक्षिण में था।
हालीकार्नासस कारिया (Caria) नाम के एक छोटे राज्य की राजधानी था। यह राज्य एशिया माइनर (Asia Minor) यानी आधुनिक अनातोलिया के दक्षिण-पश्चिमी तट पर स्थित था। यह क्षेत्र फारसी साम्राज्य (Achaemenid Persian Empire) के अंतर्गत आता था लेकिन अर्ध-स्वायत्त शासकों के नेतृत्व में था।
हालीकार्नासस इतिहास में एक और कारण से भी प्रसिद्ध है। यह इतिहास के पिता हेरोडोटस (Herodotus) का जन्मस्थान था जो 484 ईसा पूर्व में यहाँ पैदा हुए थे।
इस नगर का एक प्राकृतिक गहरा बंदरगाह था जो व्यापार और नौसेना दोनों के लिए आदर्श था। चारों ओर पहाड़ियाँ थीं जो नगर की प्राकृतिक सुरक्षा करती थीं।
हेकाटोम्निड राजवंश: वे शासक जिन्होंने कारिया को महान बनाया
मौसोलस के मकबरे की कहानी को ठीक से समझने के लिए पहले उस राजवंश को जानना जरूरी है जिसने इसे जन्म दिया।
377 ईसा पूर्व में कारिया के शासक हेकाटोम्नस (Hecatomnus) की मृत्यु हुई। वे एक कुशल शासक थे जिन्होंने फारसी साम्राज्य के अंतर्गत रहते हुए भी अपनी स्वायत्तता बनाए रखी।
हेकाटोम्नस के छह संतानें थीं। उनके राजवंश की एक अनोखी परंपरा थी। भाई-बहन आपस में विवाह करते थे। यह प्रथा मिस्र के फराओ और कुछ अन्य प्राचीन राजवंशों में भी पाई जाती थी। इसका उद्देश्य था राजसत्ता और धन परिवार के भीतर ही रखना।
हेकाटोम्नस के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र मौसोलस (Mausolus) ने सत्ता संभाली। उनके साथ उनकी बहन और पत्नी आर्टेमिसिया द्वितीय (Artemisia II) थीं।
मौसोलस: वह असाधारण शासक जिसने कारिया को एक महाशक्ति बनाया
मौसोलस ने 377 ईसा पूर्व से 353 ईसा पूर्व तक यानी लगभग 24 वर्षों तक कारिया पर शासन किया। यह शासनकाल कारिया के इतिहास का स्वर्णयुग था।
यूनानी इतिहासकार और यात्री पॉसानियास (Pausanias) ने लिखा: “आर्टेमिसिया और मौसोलस ने हालीकार्नासस और उसके आसपास के इलाकों पर 24 वर्षों तक शासन किया।”
मौसोलस की विशेषता यह थी कि वे स्थानीय अनातोलियन (Anatolian) मूल के थे लेकिन यूनानी संस्कृति के गहरे प्रशंसक थे। वे यूनानी भाषा बोलते थे, यूनानी शासन-पद्धति अपनाते थे और यूनानी कला व वास्तुकला के संरक्षक थे।
मौसोलस की प्रमुख उपलब्धियाँ:
हालीकार्नासस का पुनर्निर्माण: मौसोलस ने हालीकार्नासस को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने नई और विशाल शहरपनाह (city walls) बनाई। एक शानदार महल बनाया। एक उन्नत बंदरगाह विकसित किया। मंदिर, थिएटर और सार्वजनिक इमारतें बनवाईं। शहर को संगमरमर की मूर्तियों से सजाया।
उन्होंने हालीकार्नासस को उस समय के भूमध्यसागरीय जगत के सबसे सुंदर और भव्य नगरों में से एक बना दिया।
साम्राज्य विस्तार: मौसोलस ने अपने राज्य की सीमाएं बढ़ाईं। उन्होंने लिडिया, आयोनिया (Ionia) और विशेष रूप से लिसिया (Lycia) को जीता। लिसिया का यह अधिग्रहण बाद में बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ क्योंकि वहाँ की स्तंभ-मकबरों की परंपरा ने उन्हें अपने मकबरे की प्रेरणा दी।
यूनानी स्वायत्तता के समर्थक: जब 358 ईसा पूर्व में एशिया माइनर के यूनानी नगर-राज्यों ने फारसी सत्ता के विरुद्ध “सत्रपों के विद्रोह” (Satraps’ Revolt) में भाग लिया, तो मौसोलस ने पहले इसमें भाग लिया और फिर चतुराई से बाहर निकल गए। इससे उनकी शक्ति और बढ़ी।
लिसिया की कब्रें: वह प्रेरणा जिसने एक अजूबे को जन्म दिया
मौसोलस के मकबरे के अनोखे आकार और संरचना को समझने के लिए लिसिया की मकबरा-परंपरा को जानना जरूरी है।
जब मौसोलस ने लिसिया पर आक्रमण किया और उसे जीता, तो वहाँ उन्होंने एक अनोखी चीज देखी। लिसियाई लोग अपने मृत शासकों और नेताओं के लिए “स्तंभ-मकबरे” (Pillar Tombs) बनाते थे।
इनमें सबसे प्रसिद्ध था “नेरेइड स्मारक” (Nereid Monument) जो जेंथस (Xanthos) में था। यह एक ऊँचे आधार (podium) पर खड़ा था, उसके चारों ओर आयोनिक स्तंभ थे और उसके ऊपर एक छोटा छत-खंड (roof structure) था।
मौसोलस को यह विचार पसंद आया। उन्होंने सोचा: “इस परंपरा को कहीं अधिक बड़े और भव्य पैमाने पर क्यों न दोहराया जाए?”
इसी विचार ने उस मकबरे की नींव रखी जो इतिहास का सबसे प्रसिद्ध मकबरा बना।
मौसोलस की मृत्यु और आर्टेमिसिया का शोक: एक प्रेम कहानी जो पत्थर में ढली
353 ईसा पूर्व में मौसोलस की मृत्यु हो गई।
उनकी मृत्यु की सटीक वजह इतिहास में दर्ज नहीं है। लेकिन इतिहास ने जो दर्ज किया वह था उनकी पत्नी और बहन आर्टेमिसिया द्वितीय का अभूतपूर्व शोक।
प्राचीन लेखकों ने आर्टेमिसिया के शोक को इतिहास के सबसे गहरे विलाप के रूप में वर्णित किया है।
वेलेरियस मैक्सिमस (Valerius Maximus) ने लिखा कि आर्टेमिसिया ने अपने पति की अस्थियों को पानी में मिलाकर पीया ताकि वे स्वयं उनका जीवित मकबरा बन जाएं।
यह कहानी सच हो या प्रतीकात्मक, यह आर्टेमिसिया के अपने पति के प्रति असीम प्रेम और समर्पण की गहराई बताती है।
आर्टेमिसिया ने तय किया कि वे अपने पति के लिए ऐसा मकबरा बनाएंगी जो दुनिया में पहले कभी नहीं बना था।
पूरे ग्रीस में संदेश भेजे गए। सबसे प्रतिभाशाली वास्तुकारों और मूर्तिकारों को बुलाया गया।
सेत्रोस और पाइथियस: दो वास्तुकार, एक महान दृष्टि
मकबरे के निर्माण की जिम्मेदारी दो यूनानी वास्तुकारों को सौंपी गई।
सेत्रोस (Satyros) और पाइथियस (Pythius या Pytheos)।
रोमन वास्तुकार विट्रुवियस (Vitruvius) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “डी आर्किटेक्चुरा” (De Architectura) में लिखा कि इन दोनों वास्तुकारों ने मकबरे के बारे में एक विस्तृत ग्रंथ भी लिखा था। दुर्भाग्य से वह ग्रंथ आज उपलब्ध नहीं है।
पाइथियस पहले से ही एक महान इमारत बना चुके थे। उन्होंने प्रिएन (Priene) के एथेना के मंदिर को डिज़ाइन किया था जो अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध था।
इन दोनों ने मिलकर एक ऐसी इमारत की कल्पना की जो तीन अलग-अलग वास्तुशैलियों का अद्भुत संगम हो। नीचे मिस्री पिरामिड की विशालता, बीच में यूनानी मंदिर की भव्यता और ऊपर लिसियाई मकबरे की सीढ़ीदार छत।
यह तीन सभ्यताओं की वास्तुकला का एक ऐसा संगम था जो पहले कभी नहीं देखा गया था।
चार महान मूर्तिकार: वह “ड्रीम टीम” जिसने पत्थर को जीवंत किया
मकबरे की मूर्तिकला के लिए जो नाम बुलाए गए वे उस युग के चार सर्वश्रेष्ठ मूर्तिकार थे। हर एक को मकबरे की एक भुजा की मूर्तिकला सौंपी गई।
स्कोपास (Scopas of Paros)
स्कोपास पारोस द्वीप के थे और उस युग के सबसे भावनात्मक और शक्तिशाली मूर्तिकार माने जाते थे। उनकी शैली में मूर्तियाँ अत्यंत जीवंत और भावपूर्ण होती थीं।
स्कोपास ने इससे पहले एफेसुस के आर्टेमिस मंदिर के पुनर्निर्माण का नेतृत्व किया था। वे हालीकार्नासस का पूर्वी भाग सँभाला।
ब्राइक्सिस (Bryaxis)
ब्राइक्सिस हालीकार्नासस के ही थे। वे न केवल मूर्तिकार बल्कि धातु के काम में भी माहिर थे। उन्होंने मकबरे का उत्तरी भाग सँभाला।
ब्राइक्सिस बाद में सिकंदर महान के दरबार से भी जुड़े।
लेओखारेस (Leochares of Athens)
लेओखारेस एथेंस के थे। वे देवताओं की आदर्श और सुंदर मूर्तियाँ बनाने के लिए प्रसिद्ध थे। वे बाद में सिकंदर महान के लिए भी काम करेंगे। उन्होंने मकबरे का पश्चिमी भाग सँभाला।
टिमोथियस (Timotheus of Epidaurus)
टिमोथियस ने मकबरे का दक्षिणी भाग सँभाला। वे भी अपने समय के एक प्रतिष्ठित मूर्तिकार थे।
रोमन वास्तुकार विट्रुवियस ने एक पाँचवें कलाकार का भी उल्लेख किया है। वे कहते हैं कि प्रसिद्ध प्रैक्सिटेलेस (Praxiteles) ने शायद छत की मूर्तियाँ और विशेष रूप से शीर्ष पर रखी चतुरश्व रथ (Quadriga) की आकृतियाँ बनाई थीं। लेकिन यह निश्चित नहीं है।
प्लिनी द एल्डर ने लिखा कि जब आर्टेमिसिया और मौसोलस दोनों की मृत्यु हो गई और मकबरा अभी अधूरा था, तब भी ये कलाकार काम करते रहे। उन्होंने महसूस किया कि “यह काम एक साथ उनके स्वामी की और उनकी अपनी कला की स्मृति है।”
यह एक कलाकार के समर्पण का वह उत्कृष्ट उदाहरण है जब वह किसी कमीशन के लिए नहीं बल्कि कला के लिए काम करता है।
मकबरे की वास्तुकला: तीन संस्कृतियों का अद्भुत संगम
मकबरे की ऊँचाई लगभग 45 मीटर (148 फीट) थी जो एक आधुनिक 14 मंजिला इमारत के बराबर है।
इसकी संरचना को तीन स्पष्ट भागों में बाँटा जा सकता है।
पहला भाग: विशाल आधार (Podium)
मकबरे के सबसे नीचे था एक ऊँचा, चौड़ा, लगभग वर्गाकार आधार जो संगमरमर से बना था। इसकी दीवारों पर उभरी हुई नक्काशी (Bas-relief Friezes) थी।
इन नक्काशियों में दर्शाए गए थे:
अमेजोनोमेकी (Amazonomachy): यूनानियों और अमेजोन योद्धा-स्त्रियों के बीच युद्ध के दृश्य। यह उस काल की मूर्तिकला में बहुत प्रचलित विषय था। यह अच्छाई और बुराई, सभ्यता और बर्बरता के बीच संघर्ष का प्रतीक था।
सेंटॉरोमेकी (Centauromachy): मानवों और सेंटॉर (आधे मानव, आधे घोड़े) के बीच युद्ध के दृश्य।
रथ-दौड़ (Chariot Race) के दृश्य।
इस आधार के ऊपर 400 से अधिक स्वतंत्र खड़ी मूर्तियाँ (Freestanding Sculptures) थीं। इनमें शामिल थे: योद्धा, दरबारी, शेर, घोड़े और अन्य पशु। इनमें से कई मूर्तियों पर काँसे के आभूषण थे जैसे हथियार, कवच, मुकुट और वस्त्र जो धूप में चमकते थे।
दूसरा भाग: स्तंभों की दीर्घा (Peristyle)
आधार के ऊपर था 36 आयोनिक स्तंभों (Ionic Columns) की एक दीर्घा। प्रत्येक स्तंभ की ऊँचाई लगभग 11 मीटर थी।
“आयोनिक शैली” के ये स्तंभ यूनानी मंदिरों की याद दिलाते थे। प्रत्येक स्तंभ के बीच में एक मूर्ति खड़ी थी।
पूरी दीर्घा के पीछे एक ठोस दीवार थी जो इसकी छत का भार उठाती थी।
तीसरा भाग: सीढ़ीदार पिरामिड छत और चतुरश्व रथ
स्तंभों की दीर्घा के ऊपर था एक 24-सीढ़ियों वाला सीढ़ीदार पिरामिड (Stepped Pyramid)। यह छत ऊपर जाते-जाते छोटी होती जाती थी।
और इस पिरामिड की चोटी पर था इस पूरी संरचना का सबसे नाटकीय तत्व:
एक चतुरश्व रथ (Quadriga) जिसमें चार घोड़े थे। और इस रथ पर सवार थीं मौसोलस और आर्टेमिसिया की विशाल मूर्तियाँ, जो क्षितिज की ओर देख रही थीं।
इन मूर्तियों की ऊँचाई लगभग 6 मीटर थी। रथ के पहिये की त्रिज्या 1 मीटर से अधिक थी।
यह पूरी संरचना एक साथ मिस्री पिरामिड, यूनानी मंदिर और लिसियाई मकबरे की परंपराओं को एक नए और अद्वितीय रूप में जोड़ती थी।
मकबरे के भीतर: जहाँ मौसोलस और आर्टेमिसिया ने अनंत काल की नींद ली
मकबरे के अंदर की संरचना के बारे में नेशनल जियोग्राफिक के अनुसार:
एक छुपा हुआ प्रवेश द्वार था जो दीवार में एक पत्थर के पीछे छुपा था। यह पत्थर धातु की कड़ियों से जमीन में जड़ा था। इस प्रवेश द्वार से एक छोटी सुरंग थी जो एक कक्ष में खुलती थी।
इस भूमिगत दफन-कक्ष (Underground Burial Chamber) में स्तंभों और मूर्तियों से सजा एक वर्गाकार स्थान था। यहाँ अंत्येष्टि कलश (Funerary Urns) रखे थे जिनमें मौसोलस और आर्टेमिसिया की राख और अस्थियाँ थीं।
मौसोलस की मृत्यु के बाद जब आर्टेमिसिया ने उनकी अंत्येष्टि की तो एक विशाल समारोह हुआ। मकबरे के प्रवेश द्वार तक जाने वाली सीढ़ियों पर बड़ी संख्या में पशुओं के शव बलिदान के रूप में रखे गए। फिर सीढ़ियाँ पत्थर और मलबे से बंद कर दी गईं ताकि मकबरे को कभी कोई लूट न सके।
दो साल बाद जब आर्टेमिसिया की भी मृत्यु हुई, तो उनकी राख भी इसी कक्ष में रखी गई। मकबरा अभी भी अधूरा था लेकिन कलाकारों ने काम जारी रखा।
आर्टेमिसिया: वह रानी जो केवल पत्नी नहीं, एक महान शासक भी थी
आर्टेमिसिया को केवल एक शोकाकुल पत्नी के रूप में याद करना उनके साथ अन्याय होगा।
वे अपने समय की सबसे शक्तिशाली महिलाओं में से एक थीं।
मौसोलस की मृत्यु के बाद आर्टेमिसिया ने स्वतंत्र रूप से कारिया पर शासन किया।
उनके शासनकाल की सबसे नाटकीय घटना थी रोड्स का युद्ध (Battle of Rhodes)।
रोड्स द्वीप के यूनानियों ने सोचा कि एक अकेली रानी कमज़ोर होगी और उन्होंने हालीकार्नासस पर हमला करने की योजना बनाई। आर्टेमिसिया को इसकी खबर मिली। उन्होंने एक चालाक योजना बनाई।
उन्होंने अपने युद्धपोतों को बंदरगाह के एक छुपे हुए कोने में रखा। जब रोड्स के जहाज बंदरगाह में आए तो उन्होंने देखा कि नगर खाली लग रहा है। लेकिन जैसे ही रोड्स के सैनिक जहाज से उतरे, आर्टेमिसिया के युद्धपोत बाहर आए और रोड्स के जहाजों को चारों तरफ से घेर लिया।
आर्टेमिसिया ने रोड्स के अपने ही जहाजों पर सवार होकर रोड्स पर आक्रमण किया और उसे जीत लिया।
प्राचीन रोमन लेखक इस युद्ध को आर्टेमिसिया की सैनिक प्रतिभा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण मानते थे।
लेकिन यह सब करते हुए भी उनका मन मौसोलस के मकबरे पर लगा रहा।
निर्माण का समय और लागत: दुनिया की सबसे महंगी कब्र
आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार मकबरे का निर्माण 353 ईसा पूर्व से 351 ईसा पूर्व के बीच शुरू हुआ। लेकिन यह भी माना जाता है कि मौसोलस ने अपने जीवनकाल में ही इसकी योजना और शायद निर्माण शुरू करवाया था।
निर्माण में लगभग 20 से 25 साल लगे।
निर्माण में उपयोग हुआ:
अनातोलियन संगमरमर (Anatolian Marble) और पेंटेलिक संगमरमर (Pentelic Marble) जो एथेंस के पास पेंटेलिकोन पर्वत से आता था।
400 से अधिक स्वतंत्र मूर्तियाँ। इनमें से कई पर काँसे के अलंकरण थे।
दर्जनों विस्तृत नक्काशी-पट्टियाँ (Friezes)।
तत्कालीन यूनान के सर्वश्रेष्ठ चार मूर्तिकारों की सेवाएं।
इतनी बड़ी परियोजना की लागत के बारे में कोई सटीक आँकड़ा नहीं है लेकिन यह उस युग के किसी भी निजी निर्माण की सबसे बड़ी लागत रही होगी।
प्लिनी द एल्डर का विवरण: पहली सदी ईस्वी की एक अमूल्य गवाही
मकबरे के बारे में सबसे विस्तृत विवरण रोमन विद्वान प्लिनी द एल्डर (Pliny the Elder) ने अपनी “नेचुरल हिस्ट्री” (Naturalis Historia) में दिया है। उनका यह विवरण पहली सदी ईस्वी में लिखा गया जब मकबरा अभी भी खड़ा था।
प्लिनी ने लिखा:
“यह 25 क्यूबिट (cubit) ऊँचा है और 36 स्तंभों से घिरा है, बाहरी परिधि को ‘पटेरोन’ (Pteron) कहते हैं… पटेरोन के ऊपर एक पिरामिड है जो नीचे की इमारत जितनी ऊँची है और 24 सीढ़ियों से बनी है जो शीर्ष की ओर जाते हुए छोटी होती जाती हैं। शीर्ष पर पाइथिस द्वारा बनाई गई चार घोड़ों की रथ की आकृति है।”
यह विवरण बताता है कि मकबरे का प्रत्येक तल पिछले जितना ऊँचा था। यानी:
आधार की ऊँचाई लगभग 11 मीटर, स्तंभों की दीर्घा की ऊँचाई लगभग 11 मीटर, पिरामिड छत की ऊँचाई लगभग 11 मीटर और शीर्ष पर रथ की मूर्ति की ऊँचाई लगभग 6 मीटर।
इस प्रकार कुल ऊँचाई लगभग 45 मीटर (148 फीट) बनती है।
मकबरे का प्रभाव: जब एक इमारत ने भाषा बदल दी
मकबरा इतना प्रसिद्ध हुआ कि “मॉसोलियम (Mausoleum)” शब्द पहले यूनानी में, फिर लैटिन में और अंततः दुनिया की सभी प्रमुख भाषाओं में “भव्य मकबरे” का पर्याय बन गया।
यूनानी भूगोलविद पॉसानियास ने लिखा: “हालीकार्नासस में मौसोलस के लिए बनाया गया मकबरा इतना विशाल और इतने अलंकरण से युक्त है कि रोमन लोग अपने सभी भव्य मकबरों को ‘मॉसोलिया’ कहने लगे।”
आज की दुनिया में ताज महल भी एक तरह का मॉसोलियम है। इंडिया गेट के पास राष्ट्रीय युद्ध स्मारक भी इसी परंपरा में आता है। दुनिया भर में हजारों मॉसोलियम हैं।
और यह सब एक शासक के नाम से है जो 353 ईसा पूर्व में मरा था।
मकबरे की विरासत: जिन इमारतों पर इसकी छाप पड़ी
मौसोलस के मकबरे की वास्तुशैली ने अनेक महान इमारतों को प्रेरणा दी।
वाशिंगटन डी.सी. का मेसोनिक हाउस ऑफ टेम्पल (Masonic House of the Temple): यह इमारत सीधे हालीकार्नासस के मकबरे से प्रेरित है। इसके आकार और स्तंभों की व्यवस्था में वही तीन-भाग का विभाजन दिखता है।
भारत का ताज महल: हालाँकि ताज महल मुगल-इस्लामी परंपरा में है लेकिन ऊँचे आधार पर खड़ी मकबरा-इमारत की अवधारणा मौसोलस के मकबरे की परंपरा से जुड़ती है।
नेपोलियन का मकबरा (Paris): पेरिस के “अँवालिद (Les Invalides)” में नेपोलियन का भव्य मकबरा भी इसी परंपरा में आता है।
ग्रांट का मकबरा (New York): अमेरिकी राष्ट्रपति यूलिसेस एस. ग्रांट का न्यूयॉर्क में मकबरा भी इसी शैली में है।
मकबरे का पतन: भूकंप, क्रूसेडर और एक महल की दीवारें
मौसोलस का मकबरा प्राचीन विश्व के सात अजूबों में सबसे अधिक समय तक खड़ा रहने वाला था।
सिकंदर महान ने 334 ईसा पूर्व में हालीकार्नासस पर विजय प्राप्त की लेकिन मकबरे को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया।
रोमन शासन में भी मकबरा सुरक्षित रहा।
मध्यकाल तक यह काफी हद तक सुरक्षित था। यूरोपीय क्रूसेडर जब इस क्षेत्र से गुजरे तो उन्होंने 12वीं सदी ईस्वी में इसका उल्लेख एक “विशाल और भव्य खंडहर” के रूप में किया।
12वीं से 15वीं सदी के बीच आए भूकंपों की श्रृंखला ने मकबरे को धीरे-धीरे नष्ट कर दिया।
1494 ईस्वी में सेंट जॉन के नाइट्स (Knights of Saint John of Malta) ने बोदरुम किला (Bodrum Castle) बनाना शुरू किया। इसके लिए उन्होंने मकबरे के पत्थरों का उपयोग किया। मकबरे के संगमरमर के खंड और मूर्तियों के टुकड़े किले की दीवारों में लगाए गए।
1522 ईस्वी में जब तुर्क आक्रमण की अफवाहें फैलीं तो नाइट्स ने किले को और मजबूत बनाने के लिए मकबरे के बचे-खुचे हिस्सों को भी तोड़ डाला।
इस तरह एक महान इमारत एक किले की दीवार में समा गई।
चार्ल्स टॉमस न्यूटन: वह ब्रिटिश खोजकर्ता जिसने मकबरे को फिर से खोजा
1856 में ब्रिटिश पुरातत्वविद चार्ल्स टॉमस न्यूटन (Charles Thomas Newton) ने ब्रिटिश संग्रहालय के लिए एक अभियान शुरू किया।
यह आसान काम नहीं था। हालीकार्नासस की प्राचीन स्थल का स्थान पूरी तरह खो गया था। आधुनिक बोदरुम शहर उसके ऊपर बसा था।
न्यूटन ने एक जटिल रणनीति अपनाई। उन्होंने प्राचीन विवरणों का अध्ययन किया। प्लिनी और विट्रुवियस के विवरणों के आधार पर उन्होंने अनुमान लगाया कि मकबरा कहाँ रहा होगा।
फिर उन्होंने स्थानीय लोगों की जमीन खरीदी, किराए पर ली और कुछ मामलों में ब्रिटिश नौसेना की मदद से जबरन कब्जा किया।
खुदाई में उन्हें मिला:
मकबरे की तीन दीवारें और आधार के कोने। अमेजोनोमेकी की कुछ नक्काशी-पट्टियाँ। टूटे हुए रथ के पहिये के टुकड़े जो शीर्ष की मूर्ति के थे। दो विशाल मूर्तियाँ जो परंपरागत रूप से मौसोलस और आर्टेमिसिया की मानी जाती हैं। अनेक मूर्तियों के टुकड़े, स्तंभों के अवशेष और अन्य सजावटी टुकड़े।
ये सभी ब्रिटिश संग्रहालय ले जाए गए जहाँ आज वे “हालीकार्नासस कक्ष” (Halicarnassus Room) में रखे हैं।
तुर्की सरकार इन वस्तुओं की वापसी की माँग कर रही है लेकिन ब्रिटिश संग्रहालय ने अभी तक उन्हें लौटाने से इनकार किया है।
बोदरुम किले की दीवारों में इतिहास
एक और अत्यंत रोचक ऐतिहासिक खोज 1846 में हुई।
जब बोदरुम किले की दीवारों की जाँच की गई तो पाया गया कि उनमें मकबरे की मूर्तियों के टुकड़े चिने हुए हैं। नाइट्स ने पत्थरों को तो इस्तेमाल किया था लेकिन मूर्तियों को दीवार में चुनने से पहले एक कमरे में सुरक्षित छोड़ दिया था।
इस कमरे में दर्जनों मूर्तियाँ मिलीं जो असाधारण रूप से सुरक्षित थीं। इनमें से कुछ आज भी बोदरुम संग्रहालय में हैं और कुछ ब्रिटिश संग्रहालय में।
उनमें से एक लगभग 3 मीटर ऊँची पुरुष आकृति है जिसे मौसोलस की मूर्ति माना जाता है। यह आज ब्रिटिश संग्रहालय की सबसे प्रमुख प्रदर्शनियों में से एक है।
डेनिश हालीकार्नासस परियोजना: जब इतिहास को फिर से जीवंत करने का सपना देखा गया
2017 में एक महत्वाकांक्षी परियोजना की घोषणा हुई। डेनिश हालीकार्नासस परियोजना (Danish Halikarnassos Project) ने मकबरे के आंशिक पुनर्निर्माण का सपना देखा।
तुर्की की संस्कृति और पर्यटन मंत्रालय ने 2018 में मकबरे के स्थान पर एक खुले आसमान के नीचे संग्रहालय बनाने की योजना की घोषणा की।
2022 में शोधकर्ता अहमत डेंकर के नेतृत्व में एक टीम ने 3D पुनर्निर्माण मॉडल तैयार किया जो मकबरे को उसकी मूल भव्यता में दिखाता है।
आज बोदरुम में मकबरे के खंडहर हैं जहाँ नींव के कुछ अवशेष और कुछ पत्थर के खंड देखे जा सकते हैं। पास में एक छोटा संग्रहालय भी है।
मौसोलस के मकबरे के रोचक तथ्य
यह मकबरा गीज़ा के पिरामिड के बाद प्राचीन विश्व के अजूबों में सबसे लंबे समय तक खड़ा रहने वाला अजूबा था। इसने लगभग 1,800 वर्षों तक खड़े रहकर इतिहास देखा। “मॉसोलियम” शब्द इसी के नाम से आया जो आज दुनिया की हर भाषा में प्रयोग होता है। इसे सजाने वाले चारों मूर्तिकार उस युग के सर्वश्रेष्ठ थे और उनमें से स्कोपास ने आर्टेमिस के मंदिर पर भी काम किया था। मकबरे पर 400 से अधिक स्वतंत्र मूर्तियाँ थीं। आर्टेमिसिया ने रोड्स को जीता और फिर मकबरे का निर्माण पूरा करवाया। सिकंदर महान ने हालीकार्नासस जीता लेकिन मकबरे को नहीं छुआ। नाइट्स ऑफ सेंट जॉन ने इसके पत्थरों से बोदरुम किला बनाया। आज मकबरे के अवशेष ब्रिटिश संग्रहालय में हैं और तुर्की उनकी वापसी माँग रहा है।
बोदरुम और मकबरे का स्थान कैसे पहुँचें?
निकटतम हवाई अड्डा: बोदरुम-मिलास हवाई अड्डा (Bodrum-Milas Airport), बोदरुम शहर से लगभग 35 किलोमीटर दूर।
परिवहन: इज़मिर से बस या उड़ान से बोदरुम। इस्तांबुल से सीधी उड़ान।
मुख्य आकर्षण: मकबरे का पुरातत्व स्थल, बोदरुम का पुरातत्व संग्रहालय जहाँ मूर्तियों के टुकड़े हैं, बोदरुम किला जिसकी दीवारों में मकबरे के पत्थर हैं, और बोदरुम अंडरवाटर पुरातत्व संग्रहालय।
ब्रिटिश संग्रहालय लंदन: मकबरे की प्रमुख मूर्तियाँ और नक्काशी-पट्टियाँ यहाँ के “हालीकार्नासस कक्ष” में देखी जा सकती हैं।
निष्कर्ष: जब एक पत्नी का प्रेम पत्थर बन गया और पत्थर ने भाषा बदल दी
मौसोलस के मकबरे की कहानी की सबसे गहरी बात यह है कि यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसने मृत्यु के बाद अमरता पाई।
मौसोलस एक शासक थे। उन्होंने एक छोटे से क्षेत्र पर 24 वर्षों तक शासन किया। यह शासनकाल भले ही प्रभावशाली था लेकिन उसने कोई विश्व-विजय नहीं की, कोई महान युद्ध नहीं जीता, कोई दर्शन नहीं लिखा।
लेकिन उनकी पत्नी और बहन आर्टेमिसिया का प्रेम उनके लिए इतना गहरा था कि उन्होंने दुनिया की सबसे भव्य कब्र बनाने की ठानी।
उस कब्र को बनाने के लिए उस युग के सर्वश्रेष्ठ कलाकार आए। उन कलाकारों ने ऐसा काम किया जिसे देखकर सारी दुनिया चकित हो गई।
और उस चकित दुनिया ने उस मकबरे का नाम ऐसे बोला कि वह नाम एक सार्वभौमिक शब्द बन गया।
आज जब भी कोई किसी भव्य मकबरे को “मॉसोलियम” कहता है, तो वह अनजाने में आर्टेमिसिया के उस अदम्य प्रेम को याद कर रहा होता है जिसने रेत, पत्थर और संगमरमर में एक अमर प्रेम-गाथा लिख दी।
वह मकबरा आज नहीं है। लेकिन उसका नाम हर भाषा में जीवित है।
और यही सबसे बड़ी अमरता है।
“मौसोलस का मकबरा इतना विशाल और इतने अलंकरण से युक्त है कि रोमन लोग अपने सभी भव्य मकबरों को उसी के नाम पर ‘मॉसोलिया’ कहने लगे।” “The tomb at Halicarnassus was made for Mausolus, king of the city, and it is of such vast size, and so notable for all its ornament, that the Romans in their great admiration of it call remarkable tombs in their country ‘Mausolea’.” — पॉसानियास (Pausanias), दूसरी सदी ईस्वी
संदर्भ स्रोत: Wikipedia, World History Encyclopedia, Britannica, National Geographic, AllThatsInteresting, TheCollector, ArtNet News, ArtInContext, Study.com, Ancient Origins, 7Wonders.org