क्राइस्ट द रिडीमर: आसमान में फैली बाँहों से दुनिया को आलिंगन देती एक अमर प्रतिमा

ब्राज़ील के रियो डि जेनेरियो में खड़ी उस महान मूर्ति की पूरी कहानी जो विश्वास, कला और इंजीनियरिंग का एक अद्वितीय संगम है

रियो डि जेनेरियो की पहाड़ियों पर जब सुबह की पहली धूप पड़ती है, तो एक विशाल श्वेत आकृति सबसे पहले रोशन होती है। खुली बाँहें, शांत चेहरा और पूरे शहर को अपने आगोश में लेने की मुद्रा। यह है क्राइस्ट द रिडीमर यानी “क्रिस्टो रेदेन्टोर” (Cristo Redentor)

यह महज एक मूर्ति नहीं है। यह ब्राज़ील की आत्मा है, करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है, और दुनिया के सबसे बड़े आर्ट डेको शिल्प का जीवंत उदाहरण है।

2007 में इसे “दुनिया के सात नए अजूबों” में चुना गया। करोड़ों पर्यटक हर साल इसे देखने आते हैं। सिनेमा, संगीत, खेल और संस्कृति में इसकी छाप हर जगह दिखती है।

लेकिन इस महान प्रतिमा की कहानी उतनी ही रोचक और जटिल है जितनी वह दिखने में सरल और शांत लगती है।

आज हम इस अद्वितीय प्रतिमा के इतिहास, निर्माण, कलाकारों और इसके गहरे सांस्कृतिक महत्व को विस्तार से जानेंगे।

क्राइस्ट द रिडीमर कहाँ है?

क्राइस्ट द रिडीमर ब्राज़ील के शहर रियो डि जेनेरियो में कोर्कोवाडो पर्वत (Corcovado Mountain) की चोटी पर स्थित है। यह पर्वत 700 मीटर (लगभग 2,300 फीट) ऊँचा है और तिजुका राष्ट्रीय उद्यान (Tijuca National Park) के भीतर स्थित है।

तिजुका राष्ट्रीय उद्यान दुनिया का सबसे बड़ा शहरी वन है। यह जंगल मानव निर्मित है। 1860 के दशक में इसे हाथ से फिर से लगाया गया था जब इस क्षेत्र को पहले काट दिया गया था।

“कोर्कोवाडो” शब्द पुर्तगाली भाषा से आया है जिसका अर्थ है “कूबड़” (hunchback)। यह नाम पर्वत के आकार के कारण पड़ा जो दूर से देखने पर एक कूबड़ जैसा लगता है।

प्रतिमा के आधार सहित इसकी कुल ऊँचाई 38 मीटर (125 फीट) है जिसमें मूर्ति की ऊँचाई 30 मीटर (98 फीट) और आधार 8 मीटर (26 फीट) है। इसकी फैली हुई बाँहों का विस्तार 28 मीटर (92 फीट) है। इसका कुल वजन 635 मीट्रिक टन है।

यह प्रतिमा पूर्व दिशा की ओर मुँह किए हुए है यानी सूर्योदय की दिशा में, जैसे हर नई सुबह का स्वागत करती हो।

कोर्कोवाडो पर्वत का इतिहास: पुर्तगाली युग से शुरुआत

कोर्कोवाडो पर्वत का इतिहास 16वीं शताब्दी से शुरू होता है जब पुर्तगाली खोजकर्ता ब्राज़ील आए और उन्होंने इस प्रभावशाली पर्वत को अपना नाम दिया।

1824 में ब्राज़ील के सम्राट पेड्रो प्रथम (Dom Pedro I) ने कोर्कोवाडो पर्वत की पहली आधिकारिक यात्रा का नेतृत्व किया। उनकी यह यात्रा पर्वत के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करती है।

1882 में कोस्मे वेल्हो से कोर्कोवाडो तक एक रेलवे लाइन बिछाई गई। यह ब्राज़ील की पहली इलेक्ट्रिक रेलवे थी और साथ ही देश की पहली रेलवे जो विशेष रूप से पर्यटकों के लिए बनाई गई थी। बाद में इसी रेलवे का उपयोग मूर्ति निर्माण के लिए सामग्री और मजदूरों को ऊपर पहुँचाने में किया गया।

पहला प्रस्ताव: 1850 के दशक की एक पुरोहित की दृष्टि

क्राइस्ट द रिडीमर के निर्माण की कहानी 1850 के दशक में शुरू होती है।

विसेंटियन पुरोहित पेड्रो मारिया बॉस (Pedro Maria Boss) जब पहली बार रियो डि जेनेरियो आए तो कोर्कोवाडो पर्वत की भव्यता देखकर उनके मन में एक विचार आया। उन्होंने सुझाया कि इस पर्वत की चोटी पर एक ईसाई स्मारक बनाया जाए।

उनका यह सुझाव एक विशेष उद्देश्य से जुड़ा था। वे चाहते थे कि यह स्मारक राजकुमारी इसाबेल (Princess Isabel) के सम्मान में बनाया जाए जो ब्राज़ील के सम्राट पेड्रो द्वितीय की पुत्री और देश की राजप्रतिनिधि थीं।

राजकुमारी इसाबेल का ब्राज़ील के इतिहास में एक बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। 1888 में उन्होंने “गोल्डन लॉ” (Lei Áurea) पर हस्ताक्षर करके ब्राज़ील में दासता का पूर्ण उन्मूलन कर दिया था। इस एक कदम ने लाखों गुलामों को आज़ादी दी।

फादर बॉस ने राजकुमारी इसाबेल से इस परियोजना के लिए धन माँगा। लेकिन राजकुमारी ने एक ऐतिहासिक उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि “ईसा मसीह ही मानव जाति के सच्चे मुक्तिदाता हैं, उन्हीं की मूर्ति बनाई जाए।”

परियोजना आगे नहीं बढ़ी। और फिर 1889 में एक बड़ा बदलाव आया।

गणतंत्र की स्थापना और पहले प्रस्ताव का अंत: 1889

1889 में ब्राज़ील ने राजतंत्र का अंत करके गणतंत्र की स्थापना की। इसके साथ ही चर्च और राज्य का अलगाव घोषित किया गया।

इस अलगाव के बाद किसी सरकारी या राजकीय पहल पर धार्मिक स्मारक बनाना संभव नहीं रहा। फादर बॉस का प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया।

लेकिन विचार मरा नहीं। वह केवल कुछ दशकों के लिए सो गया था।

दूसरा प्रयास: 1920 में कैथोलिक समुदाय की पहल

प्रथम विश्व युद्ध के बाद का दौर पूरी दुनिया में उथल-पुथल भरा था। ब्राज़ील भी इससे अछूता नहीं था। चर्च के अधिकारियों को लगा कि आधुनिकता की आँधी में धार्मिक आस्था कमजोर पड़ रही है।

1920 में रियो डि जेनेरियो के कैथोलिक सर्कल (Catholic Circle) ने एक नई पहल की। उन्होंने “मोनुमेंट वीक” (Monument Week) का आयोजन किया जिसमें लोगों से हस्ताक्षर और दान इकट्ठा किए गए।

1921 में रियो डि जेनेरियो के रोमन कैथोलिक आर्कडायसिस (Archdiocese) ने आधिकारिक रूप से कोर्कोवाडो पर्वत की चोटी पर ईसा मसीह की प्रतिमा बनाने का प्रस्ताव रखा।

तर्क सरल था: पर्वत की कमांडिंग ऊँचाई से यह प्रतिमा रियो के हर कोने से दिखाई देगी, जैसे ईसा मसीह पूरे शहर की रक्षा कर रहे हों।

धन कैसे जुटाया गया? ब्राज़ील का पहला जनकोष अभियान

यह परियोजना पूरी तरह ब्राज़ील के लोगों के दान पर निर्भर थी। यह उस दौर का पहला बड़ा क्राउडफंडिंग अभियान था।

पूरे देश में चर्चों और पैरिशों ने व्यवस्थित तरीके से दान एकत्र किया। समाज के हर वर्ग ने इसमें योगदान दिया। किसान, मजदूर, व्यापारी और कुलीन सभी ने अपनी क्षमता के अनुसार दान दिया।

अंततः इस परियोजना की कुल लागत $250,000 (अमेरिकी डॉलर) आई जो आज के हिसाब से लगभग $4.8 मिलियन के बराबर है। यह पूरी राशि ब्राज़ील के आम नागरिकों के दान से जुटाई गई।

इस तथ्य का अपना ऐतिहासिक महत्व है। यह मूर्ति किसी राजा या सरकार की महत्वाकांक्षा का परिणाम नहीं है। यह एक राष्ट्र की सामूहिक आस्था का प्रतीक है।

नींव की पहली ईंट: 4 अप्रैल 1922

4 अप्रैल 1922 को एक ऐतिहासिक समारोह में प्रतिमा के आधार की नींव की पहली पत्थर रखी गई।

यह तारीख संयोग नहीं थी। इसी दिन ब्राज़ील ने पुर्तगाल से अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी मनाई थी। इस तरह यह प्रतिमा राष्ट्रीय स्वतंत्रता के शताब्दी उत्सव से जुड़ गई।

एक बड़ी बात यह थी कि नींव रखते समय प्रतिमा का अंतिम डिज़ाइन अभी तय नहीं हुआ था। आयोजकों में इस बारे में अभी बहस चल रही थी।

डिज़ाइन की खोज: प्रतियोगिता और अनेक कल्पनाएँ

प्रतिमा के डिज़ाइन के लिए एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित की गई।

शुरुआत में कई अलग-अलग डिज़ाइन सुझाए गए:

पहला सुझाव था ईसा मसीह हाथ में क्रॉस और दूसरे हाथ में ग्लोब पकड़े हुए। लेकिन आलोचकों ने इसे देखकर मज़ाकिया लहजे में कहा कि यह “बॉल पकड़े हुए क्राइस्ट” जैसा लगता है। इससे यह डिज़ाइन खारिज हो गया।

दूसरा सुझाव एक बड़े क्रॉस पर ईसा मसीह की आकृति का था।

तीसरा सुझाव था विश्व का प्रतीक बनाने वाला एक आधार।

अंततः ब्राज़ीलियन इंजीनियर हेइटर दा सिल्वा कोस्टा (Heitor da Silva Costa) का डिज़ाइन चुना गया। वे रियो के मूल निवासी थे।

उनके मूल स्केच में ईसा मसीह के हाथ में क्रॉस था। लेकिन ब्राज़ीलियन कलाकार कार्लोस ओसवाल्ड (Carlos Oswald) के साथ मिलकर काम करते हुए डिज़ाइन बदलता गया।

ओसवाल्ड को ही “खुली बाँहों वाली खड़ी मुद्रा” का श्रेय दिया जाता है। यह मुद्रा एक साथ कई भावनाएँ व्यक्त करती है। फैली बाँहें क्रॉस का आकार बनाती हैं जो बलिदान का प्रतीक हैं। वहीं यही बाँहें “स्वागत का आलिंगन” भी है जो कहती है कि यहाँ हर कोई आ सकता है।

पॉल लांदोव्स्की: वह फ्रांसीसी मूर्तिकार जिसने इसे रूप दिया

1922 में हेइटर दा सिल्वा कोस्टा पेरिस गए किसी ऐसे मूर्तिकार की खोज में जो ओसवाल्ड के रेखाचित्रों को साकार कर सके।

पेरिस में उनकी मुलाकात पॉल लांदोव्स्की (Paul Landowski) से हुई। लांदोव्स्की फ्रांसीसी-पोलिश मूल के थे और उस समय के सबसे प्रसिद्ध मूर्तिकारों में से एक थे।

3 नवंबर 1924 को आधिकारिक रूप से लांदोव्स्की को यह जिम्मेदारी सौंपी गई।

लांदोव्स्की ने इस परियोजना को एक कलाकार की स्वतंत्रता के साथ स्वीकार किया। उन्होंने ओसवाल्ड के रेखाचित्रों में अपनी कलात्मक दृष्टि जोड़ी। मूर्ति के वस्त्रों को और प्रभावशाली बनाया। अनुपातों को लियोनार्दो दा विंची के शरीर रचना के चित्रों के आधार पर संशोधित किया।

लांदोव्स्की ने अपने बोलोन्ये-बिलांकोर (Boulogne-Billancourt) स्थित पेरिस के स्टूडियो में मूर्ति के अलग-अलग हिस्सों को मिट्टी में बनाया। इन हिस्सों को बाद में जहाज के जरिए ब्राज़ील भेजा गया।

लांदोव्स्की ने मूर्ति के निर्माण में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत खोजा जिसे उन्होंने अपनी डायरी में दर्ज किया।

उन्होंने लिखा: “जितनी बड़ी मूर्ति होती है, उतना ही छोटा सिर रखना पड़ता है। जीवन-आकार के लिए सिर की माप शरीर का साढ़े सात हिस्सा होती है, लेकिन जैसे-जैसे आकार बढ़ता है यह अनुपात बदलना पड़ता है।”

उन्होंने आगे लिखा कि “क्रिस्टो रेदेन्तोर” में उन्होंने शरीर का बारह गुना सिर रखा ताकि नीचे से देखने पर यह सही लगे।

रोमानियाई मूर्तिकार: चेहरे का शिल्पी

मूर्ति के चेहरे का काम एक अलग कलाकार ने किया। लांदोव्स्की ने अपने साथी पेरिसवासी रोमानियाई मूर्तिकार घेऑर्घे लेओनिदा (Gheorghe Leonida) को यह नाजुक और महत्वपूर्ण काम सौंपा।

लेओनिदा ने बुखारेस्ट के फाइन आर्ट्स कंजर्वेटरी और इटली में मूर्तिकला का प्रशिक्षण लिया था। उन्होंने ईसा मसीह का जो चेहरा बनाया वह शांत, करुणामय और सर्वव्यापी दिखता है।

निर्माण की असली चुनौती: 700 मीटर ऊँचे पर्वत पर काम

1926 में जब वास्तविक निर्माण कार्य शुरू हुआ तो इंजीनियरों के सामने एक बड़ी चुनौती थी: इतनी ऊँची जगह पर इतने भारी सामान को कैसे पहुँचाया जाए?

इसका समाधान पहले से बनी कोर्कोवाडो रेलवे ने किया। सभी निर्माण सामग्री और मजदूरों को रेलगाड़ी के जरिए पर्वत की चोटी तक पहुँचाया गया।

प्रतिदिन मजदूरों को रेलवे से ऊपर लाया जाता और शाम को वापस भेजा जाता। कुछ मजदूर चोटी पर ही रहते थे।

प्रबलित कंक्रीट: इस्पात की जगह नया विकल्प

इस परियोजना में एक महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग निर्णय लिया गया।

शुरुआत में इस्पात (steel) से बनाने का प्रस्ताव था। लेकिन फ्रांसीसी इंजीनियर अल्बर्ट काकुए (Albert Caquot) जो पुलों, बाँधों और हवाई पोतों के लिए प्रसिद्ध थे, ने प्रबलित कंक्रीट (Reinforced Concrete) का सुझाव दिया।

यह निर्णय क्रांतिकारी था। क्रॉस के आकार की इस मूर्ति के लिए कंक्रीट इस्पात से ज्यादा उपयुक्त था। आधार के लिए कंक्रीट स्वीडन के लिमहाम्न (Limhamn) शहर से मँगवाया गया।

साबुन पत्थर की परत: एक पेरिस की याद से जन्मा विचार

प्रतिमा के बाहरी आवरण के लिए एक अनोखी सामग्री चुनी गई।

1925 में जब हेइटर दा सिल्वा कोस्टा पेरिस की एक ढकी हुई गैलरी (arcade) से गुजर रहे थे, तो उनकी नज़र शाँज एलिज़े की एक फव्वारे पर पड़ी जो साबुन पत्थर (Soapstone) से बनी थी। इसकी नरम और चमकदार सतह ने उन्हें मोह लिया।

उन्होंने सोचा: कंक्रीट की खुरदरी सतह को साबुन पत्थर की नरम, चमकदार परत से ढक दिया जाए तो यह कहीं अधिक सुंदर दिखेगी।

साबुन पत्थर (Soapstone) को ब्राज़ील के मिनास जेरायस (Minas Gerais) राज्य की कारांदाई (Carandaí) खदान से मँगवाया गया। यह पत्थर पहले भी 18वीं सदी के महान ब्राज़ीलियन मूर्तिकार अलेजादीन्यो (Aleijadinho) के कामों में उपयोग हो चुका था और वे कार्य 120 साल बाद भी उत्कृष्ट स्थिति में थे।

साबुन पत्थर के गुण:

यह टिकाऊ है और भारी मौसम में भी खराब नहीं होता। यह गर्मी प्रतिरोधी है। इसमें जल-अवरोधी गुण हैं। यह आसानी से तराशा जा सकता है। और धूप में इसकी एक रहस्यमय चमक आती है जो मूर्ति को एक दिव्य आभा देती है।

पत्थर को छोटे-छोटे त्रिकोणाकार टाइलों में काटा गया। प्रत्येक टाइल लगभग 4 सेंटीमीटर लंबी और 0.5 सेंटीमीटर मोटी थी। पूरी मूर्ति पर लगभग 60 लाख (6 मिलियन) साबुन पत्थर की टाइलें लगाई गईं।

जिन हाथों ने टाइलें लगाईं: रियो की महिलाओं का योगदान

एक अत्यंत रोचक ऐतिहासिक तथ्य यह है कि मूर्ति की बाहरी साबुन पत्थर की मोज़ेक परत को रियो के समाज की महिलाओं के हाथों से लगाया गया था।

पत्थर की टाइलों को पहले कपड़े की पट्टियों पर सिलकर जोड़ा जाता था। फिर इन पट्टियों को मूर्ति की सतह पर चिपकाया जाता था। यह नाजुक और धैर्य माँगने वाला काम था जिसके लिए उस दौर की ब्राज़ीलियन महिलाओं ने स्वेच्छा से आगे आकर यह योगदान दिया।

मूर्ति का परिवहन: पेरिस से रियो तक एक असाधारण यात्रा

मूर्ति के विभिन्न हिस्से पेरिस के लांदोव्स्की के स्टूडियो में बने। इन्हें जहाज के जरिए ब्राज़ील भेजा गया।

परिवहन की समस्या के कारण लांदोव्स्की को मूर्ति को अलग-अलग भागों में बनाना पड़ा। विशेष रूप से मूर्ति का सिर और हाथ पूरे आकार में बनाए गए। इन्हें बेहद सावधानी से पैक करके जहाज पर चढ़ाया गया।

जब ये हिस्से ब्राज़ील पहुँचे तो रेलवे से कोर्कोवाडो की चोटी पर ले जाए गए। वहाँ एक विशाल मचान (scaffolding) तैयार की गई जो एक खड़े इंसान के आकार में थी।

मजदूर प्रतिदिन इस मचान पर चढ़कर एक-एक टुकड़े को सही जगह जोड़ते थे। यह काम अत्यंत सूक्ष्म और सटीकता माँगने वाला था।

उद्घाटन समारोह: 12 अक्टूबर 1931

9 साल की कठिन मेहनत के बाद 12 अक्टूबर 1931 को क्राइस्ट द रिडीमर का उद्घाटन हुआ।

उद्घाटन समारोह में उपस्थित थे:

कार्डिनल डोम सेबस्तियाओ लेमे (Cardinal Dom Sebastião Leme) जो रियो के आर्कबिशप थे। गेतुलियो वार्गास (Getúlio Vargas) जो उस समय ब्राज़ील की अनंतिम सरकार के प्रमुख थे। समस्त मंत्री और हजारों नागरिक।

उद्घाटन की योजना थी कि इतालवी रेडियो अग्रणी गुग्लिएल्मो मार्कोनी (Guglielmo Marconi) रोम से 9,200 किलोमीटर दूर बैठे-बैठे शॉर्टवेव रेडियो के जरिए मूर्ति की रोशनी चालू करेंगे। यह उस युग की तकनीकी कल्पना का एक शानदार प्रदर्शन था।

लेकिन बुरे मौसम ने इस योजना को विफल कर दिया। रोशनी अंततः स्थल पर ही चालू करनी पड़ी।

इसके बावजूद जब मूर्ति पहली बार रोशनी में नहाई तो पूरा रियो जगमगा उठा। यह पल ब्राज़ील के इतिहास के सबसे भावनात्मक क्षणों में से एक था।

आर्ट डेको शैली: इस मूर्ति की कलात्मक पहचान

क्राइस्ट द रिडीमर “आर्ट डेको” (Art Deco) शैली की दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति है।

आर्ट डेको 1920 और 1930 के दशक की एक प्रमुख कला शैली थी जो उस काल में न्यूयॉर्क और शिकागो में बन रहे गगनचुंबी इमारतों में भी दिखती थी।

इस शैली की विशेषताएँ:

सरलता और स्पष्टता : आकार सीधे और साफ होते हैं। ज्यामितीय अनुपात: रेखाएँ और आकार गणितीय सटीकता से बने होते हैं। भव्यता: बड़े पैमाने पर निर्मित, जो देखने वाले पर गहरा प्रभाव छोड़े। सौंदर्य और कार्यक्षमता का समन्वय: सुंदर दिखने के साथ-साथ टिकाऊ भी।

इस मूर्ति में लांदोव्स्की ने आर्ट डेको की इन सभी विशेषताओं को धर्म और आध्यात्मिकता के साथ अद्भुत तरीके से जोड़ा।

बिजली की मार: प्रकृति बनाम पत्थर

कोर्कोवाडो पर्वत की ऊँचाई और रियो की उष्णकटिबंधीय जलवायु के कारण यह मूर्ति बार-बार बिजली की चपेट में आती है।

10 फरवरी 2008 को एक भयंकर तूफान के दौरान बिजली मूर्ति पर गिरी जिससे उंगलियों, सिर और भौहों को नुकसान पहुँचा। रियो सरकार ने तुरंत कुछ बाहरी साबुन पत्थर की परतें बदलने और बिजली की छड़ों की मरम्मत का काम शुरू किया।

17 जनवरी 2014 को फिर बिजली गिरी जिससे दाहिने हाथ की एक उंगली टूट गई।

2021 में मूर्ति के सिर के पास लगी बिजली की छड़ों (lightning rods) की संख्या को चौगुना कर दिया गया।

जीर्णोद्धार और संरक्षण के प्रयास

दशकों में इस मूर्ति की कई बार मरम्मत और जीर्णोद्धार हुआ है।

1980 में पोप जॉन पॉल द्वितीय की ब्राज़ील यात्रा से पहले मूर्ति की व्यापक सफाई की गई।

1990 में रियो के आर्कडायसिस, मीडिया कंपनी ग्रुपो ग्लोबो, तेल कंपनी शेल, पर्यावरण नियामक IBAMA और शहर प्रशासन के बीच एक संयुक्त समझौता हुआ जिसके तहत नियमित रखरखाव का जिम्मा बाँटा गया।

2003 में एस्केलेटर, वॉकवे और पैनोरामिक लिफ्ट लगाई गईं जिससे बुजुर्ग और दिव्यांग पर्यटकों के लिए मूर्ति तक पहुँचना आसान हो गया। पहले मूर्ति तक पहुँचने के लिए 200 से अधिक सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती थीं।

2010 में चार महीने का व्यापक जीर्णोद्धार हुआ जिसमें 100 से अधिक लोग काम पर लगे। इसमें मूर्ति की बाहरी सतह को साफ किया गया, टूटी टाइलें बदली गईं, 60,000 से अधिक नए पत्थर लगाए गए जो उसी खदान से आए जहाँ से मूल पत्थर आए थे। इसके अलावा आंतरिक लोहे के ढाँचे को मजबूत किया गया और जल-रोधन किया गया।

एक दुखद घटना भी हुई। जीर्णोद्धार के दौरान कुछ तोड़फोड़ करने वालों ने मूर्ति के एक हाथ पर स्प्रे पेंट कर दिया। रियो के मेयर एडुआर्डो पाएस ने इसे “राष्ट्र के विरुद्ध अपराध” बताया। बाद में दोषियों ने माफी माँगी और पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया।

एक गिरजाघर मूर्ति के भीतर

यह बहुत कम लोग जानते हैं कि क्राइस्ट द रिडीमर के आधार के अंदर एक छोटा सा “अवर लेडी ऑफ अपेरेसिदा” (Our Lady of Aparecida) चर्च स्थित है।

12 अक्टूबर 2006 को मूर्ति की 75वीं वर्षगाँठ पर रियो के आर्कबिशप ने इस चर्च को पवित्र किया। यहाँ आज भी शादियाँ और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। पर्यटक मूर्ति के बाहर से भीतर नहीं जा सकते लेकिन चर्च में प्रवेश संभव है।

मूर्ति के अंदर जाना साधारण तौर पर संभव नहीं है। इसके लिए रियो के बिशप की अनुमति, विशेष सीढ़ियाँ और मचान और एक कर्मचारी की उपस्थिति जरूरी है।

2007: दुनिया के सात नए अजूबों में स्थान

2007 में न्यू7वंडर्स फाउंडेशन (New7Wonders Foundation) ने दुनिया भर में मतदान कराया। इसमें 10 करोड़ से अधिक लोगों ने मोबाइल और इंटरनेट से मत दिए।

ब्राज़ीलियन नागरिकों ने बड़ी संख्या में अपने “क्रिस्टो” के लिए वोट किया। परिणामस्वरूप क्राइस्ट द रिडीमर को दुनिया के सात नए अजूबों में स्थान मिला। इस सूची में वह न्यूयॉर्क की स्टैचू ऑफ लिबर्टी को भी पीछे छोड़ गया।

लिस्बन में जुलाई 2007 में विजेताओं की घोषणा हुई। रियो के आर्कबिशप डोम इउसेबियो ऑस्कर शाइड (Dom Eusebio Oscar Scheid) को बर्नार्ड वेबर से भागीदारी का प्रमाण पत्र मिला। जब विजय की खबर आई तो पूरा ब्राज़ील जश्न में डूब गया।

सांस्कृतिक प्रभाव: सिनेमा, संगीत और खेल में छाप

क्राइस्ट द रिडीमर केवल एक धार्मिक या ऐतिहासिक स्थल नहीं है। यह ब्राज़ीलियन संस्कृति में इतनी गहराई से समाया है कि इसकी छाप हर जगह दिखती है।

संगीत में: महान ब्राज़ीलियन संगीतकार टॉम जोबिम (Tom Jobim) ने 1960 में “कोर्कोवाडो” शीर्षक से एक बोसा नोवा गीत लिखा। इस गीत की लाइनें हैं: “दा जानेला वे-से ओ कोर्कोवाडो / ओ रेदेन्तोर क्वे लिंदो” (खिड़की से कोर्कोवाडो दिखता है / मुक्तिदाता कितना सुंदर है)। इस गीत को फ्रैंक सिनात्रा से लेकर एंड्रिया बोचेली तक अनेक कलाकारों ने गाया।

सिनेमा में: यह मूर्ति अनेक हॉलीवुड फिल्मों में दिखी है जिनमें शामिल हैं बेट डेविस की “नाउ वॉयेजर”, अल्फ्रेड हिचकॉक की “नोटोरियस” और “ट्वाइलाइट सागा: ब्रेकिंग डॉन पार्ट 1”

खेल में: 1998 फीफा विश्व कप के दौरान टायर निर्माता पिरेली ने एक विज्ञापन बनाया जिसमें ब्राज़ीलियन फुटबॉलर रोनाल्दो को मूर्ति की जगह खड़ा दिखाया गया। रोनाल्दो का गोल करने के बाद दोनों बाँहें फैलाकर जश्न मनाने का अंदाज ही इस विज्ञापन की प्रेरणा था।

पोस्टकार्ड और पर्यटन में: द्वितीय विश्व युद्ध से पहले भी पैनएम एयरवेज, रॉयल मेल और एयरोपोस्टाले जैसी कंपनियों के यात्रा-पोस्टर में कोर्कोवाडो और क्राइस्ट द रिडीमर दक्षिण अमेरिका का प्रवेश द्वार दिखाई देते थे।

कोविड-19 महामारी के दौरान: 2020 में मूर्ति पर स्वास्थ्यकर्मियों की तस्वीरें प्रक्षेपित की गईं जो उनके प्रति श्रद्धांजलि थी।

क्राइस्ट द रिडीमर के रोचक तथ्य

मूर्ति का प्रत्येक हाथ लगभग 3.2 मीटर (10.5 फीट) लंबा है यानी लगभग तीन लोगों जितना। मूर्ति हर साल औसतन 6 बार बिजली की चपेट में आती है। मूर्ति के अंदर एक संकरा रास्ता है लेकिन यह आम पर्यटकों के लिए बंद है। यह दुनिया की सबसे बड़ी आर्ट डेको मूर्ति है। ईसा मसीह की सबसे ऊँची प्रतिमाएँ बनाने की होड़ में यह चौथे स्थान पर है। इससे ऊँची मूर्तियाँ बोलीविया में “क्रिस्टो दे ला कोंकोर्दिया” और पोलैंड में “क्राइस्ट द किंग” हैं। मूर्ति को हर साल 7.5 लाख से अधिक पर्यटक देखने आते हैं। निर्माण में ब्राज़ीलियन, फ्रांसीसी और रोमानियाई कलाकारों और इंजीनियरों का अनोखा अंतरराष्ट्रीय सहयोग था।

क्राइस्ट द रिडीमर कैसे पहुँचें?

रियो डि जेनेरियो ब्राज़ील का सबसे बड़ा और प्रमुख पर्यटन शहर है। यहाँ से कोर्कोवाडो पहुँचने के कई तरीके हैं।

कोर्कोवाडो रेलवे: कोस्मे वेल्हो स्टेशन से ऐतिहासिक रेलगाड़ी पर्वत की चोटी तक जाती है। यह ब्राज़ील का सबसे पुराना इलेक्ट्रिक रेलमार्ग है और यात्रा का सबसे लोकप्रिय और रोमांचक तरीका है।

मिनीवैन और बस: कुछ टूर ऑपरेटर सड़क मार्ग से भी ऊपर तक जाते हैं।

पैदल: इंका ट्रेल जैसी ट्रेकिंग के शौकीनों के लिए तिजुका वन में पैदल रास्ते हैं।

यात्रा सलाह: सुबह जल्दी जाएँ क्योंकि दोपहर बाद बादल आ जाते हैं। मानसून में मूर्ति बादलों में ढक जाती है। टिकट पहले से बुक करें।

निष्कर्ष: खुली बाँहें और एक अनंत संदेश

क्राइस्ट द रिडीमर केवल एक धार्मिक प्रतिमा नहीं है। यह मानव जाति के सबसे गहरे भावों का प्रतीक है: स्वागत, करुणा, क्षमा और आशा।

यह एक ऐसी मूर्ति है जो किसी एक राजा या सरकार ने नहीं बनाई। इसे एक पूरे राष्ट्र ने मिलकर अपनी जेब से, अपनी आस्था से, अपनी मेहनत से बनाया।

इसे एक ब्राज़ीलियन इंजीनियर ने कल्पना दी, एक ब्राज़ीलियन कलाकार ने मुद्रा दी, एक फ्रांसीसी मूर्तिकार ने आकार दिया, एक रोमानियाई शिल्पकार ने चेहरा दिया और एक फ्रांसीसी इंजीनियर ने ढाँचा तैयार किया। यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग की एक मिसाल है।

जब आप रियो की व्यस्त सड़कों पर चलते हैं या गुआनाबारा खाड़ी से शहर को देखते हैं, तो कोर्कोवाडो की चोटी पर वह सफेद आकृति हमेशा दिखती है। खुली बाँहें हमेशा वैसी ही रहती हैं।

यह हर आने वाले से कहती है: “आओ, यहाँ सब का स्वागत है।”

शायद यही इस प्रतिमा का सबसे बड़ा संदेश है। और यही संदेश इसे अमर बनाता है।

“क्राइस्ट द रिडीमर केवल पत्थर और कंक्रीट की एक संरचना नहीं है। यह उन करोड़ों लोगों की साझा उम्मीद और आस्था का मूर्त रूप है जिन्होंने इसे बनाया, जो इसे देखते हैं और जो इसकी छाँव में जीते हैं।”

संदर्भ स्रोत: Britannica, Wikipedia, National Geographic, The Collector, History Hit, Google Arts and Culture, EBSCO Research, Newcity Brazil, Art in Context

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