प्राचीन विश्व के सात अजूबों में उस महाकाय मूर्ति की पूरी कहानी जो 800 साल तक मानव सभ्यता का सर्वोच्च कलाकृति था और जो आज केवल शब्दों और कल्पना में जीवित है
पाँचवीं सदी ईसा पूर्व का ग्रीस। ओलंपिया का पवित्र अभयारण्य। एक विशाल मंदिर के अंदर अँधेरे में जब एक तीर्थयात्री प्रवेश करता था तो उसकी आँखें पहले कुछ देख नहीं पाती थीं।
फिर धीरे-धीरे, मंदिर के द्वार से आती रोशनी में, हाथीदाँत और सोने का एक विशाल आकार उभरता था। एक दाढ़ीदार चेहरा जो शांत था फिर भी तेजस्वी था। एक हाथ में जीत की देवी नाइकी की छोटी सी प्रतिमा। दूसरे हाथ में बाज के साथ एक राजदंड। और ऊपर, इतना ऊँचा कि लगता था अगर यह देवता उठकर खड़ा हो जाए तो मंदिर की छत टूट जाए।
यह था ओलंपिया में ज़ीउस की मूर्ति, प्राचीन विश्व के सात अजूबों में से एक।
रोमन इतिहासकार लिवी (Livy) ने लिखा कि जब रोमन सेनापति ऐमिलियस पॉलस (Aemilius Paullus) ने पहली बार यह मूर्ति देखी तो वे अपनी आत्मा की गहराई तक हिल गए, जैसे उन्होंने स्वयं देवता को देख लिया हो।
यूनानी दार्शनिक डायो क्राइसोस्तम (Dio Chrysostom) ने कहा कि इस मूर्ति की एक झलक मात्र से इंसान की सारी तकलीफें और डर पल भर के लिए गायब हो जाते थे।
और रोमन लेखक प्लिनी द एल्डर (Pliny the Elder) ने इसे “एक ऐसी कलाकृति जिसकी बराबरी किसी ने कभी नहीं की” कहा।
800 साल तक यह मूर्ति दुनिया की सबसे महान कलाकृति मानी जाती रही। फिर एक दिन यह गायब हो गई। आज इसकी कोई प्रति तक नहीं बची। हम इसे केवल उन लोगों के शब्दों में जानते हैं जिन्होंने इसे देखा था।
आज हम इस महान मूर्ति की पूरी कहानी जानेंगे।
ओलंपिया: वह पवित्र भूमि जहाँ देवता और मनुष्य मिलते थे
ओलंपिया में ज़ीउस की मूर्ति को समझने के लिए पहले ओलंपिया को समझना जरूरी है।
ओलंपिया यूनान के पश्चिमी पेलोपोनीस (Peloponnese) में अल्फियोस नदी (Alpheios River) के उत्तरी किनारे पर स्थित एक पवित्र अभयारण्य था। यह एथेंस से लगभग 150 किलोमीटर पश्चिम में था।
यहाँ की भूमि को “अल्टिस” (Altis) यानी “पवित्र उपवन” कहा जाता था। यह भूमि देवताओं के राजा ज़ीउस को समर्पित थी।
ओलंपिया का महत्व दो कारणों से असाधारण था।
पहला कारण: ओलंपिक खेल। यहाँ 776 ईसा पूर्व से हर चार साल पर “ओलंपिक खेल” (Olympic Games) होते थे। ये खेल 393 ईस्वी तक अनवरत चले यानी लगभग 1,170 वर्षों तक। इन खेलों के दौरान पूरे ग्रीस में पवित्र युद्धविराम (Sacred Truce) होता था। युद्धरत नगर-राज्य भी हथियार रखकर एक-दूसरे के साथ शांति से खेलों में भाग लेते थे।
दूसरा कारण: धार्मिक महत्व। ओलंपिया ग्रीस का सबसे पवित्र धार्मिक केंद्र था। यहाँ ज़ीउस के अलावा हेरा, पेलोप्स और अन्य देवताओं के मंदिर थे। यहाँ से पूरे भूमध्यसागरीय जगत से तीर्थयात्री आते थे।
मानव उपस्थिति के प्रमाण यहाँ नवपाषाण काल से मिलते हैं। धीरे-धीरे यह एक छोटी बस्ती से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्रों में से एक बन गया।
ज़ीउस कौन थे? उस महाशक्ति को जानिए जिसकी मूर्ति बनी
ज़ीउस (Zeus) प्राचीन यूनानी धर्म के देवताओं के राजा थे। वे ओलंपस पर्वत (Mount Olympus) पर रहते थे जो यूनान की सबसे ऊँची चोटी है।
ज़ीउस आकाश, बिजली और गरज के देवता थे। उनके हाथ में वज्र (Thunderbolt) था जो उनकी सबसे बड़ी शक्ति का प्रतीक था। उनके साथी जानवर बाज और बैल थे।
वे क्रोनस (Cronus) और रिया (Rhea) के पुत्र थे। जन्म के समय उनके पिता क्रोनस ने उन्हें निगलने की कोशिश की क्योंकि उन्हें डर था कि उनका पुत्र उन्हें उखाड़ फेंकेगा। लेकिन ज़ीउस बच गए और बड़े होकर उन्होंने अपने पिता को परास्त किया।
ज़ीउस न्याय, व्यवस्था और कानून के संरक्षक थे। राजाओं को उन्हीं से शक्ति मिलती थी। अतिथि देवो भव की परंपरा उन्हीं से जुड़ी थी क्योंकि वे “ज़ेनिओस ज़ीउस” (Xenios Zeus) यानी अतिथियों के रक्षक भी थे।
रोमन पौराणिक कथाओं में ज़ीउस का समकक्ष “जुपिटर” (Jupiter) है।
ओलंपिया में हर चार साल पर ज़ीउस के सम्मान में खेल होते थे। यह उनका सबसे बड़ा पवित्र स्थल था। तो स्वाभाविक था कि यहाँ उनकी सबसे भव्य मूर्ति होनी चाहिए।
ज़ीउस का मंदिर: वह विशाल भवन जो मूर्ति का घर बना
ज़ीउस की मूर्ति के बारे में जानने से पहले उस मंदिर को जानना जरूरी है जिसमें वह स्थापित थी।
ज़ीउस का मंदिर (Temple of Zeus) का निर्माण 472 ईसा पूर्व से 456 ईसा पूर्व के बीच हुआ। इसे एलिस के वास्तुकार लिबोन (Libon of Elis) ने डिज़ाइन किया था।
यह मंदिर “डोरिक शैली” (Doric Style) में बना था जो यूनानी वास्तुकला की सबसे सरल और मजबूत शैली थी। मंदिर की विशेषताएं:
बाहर से मंदिर 13 स्तंभ लंबा और 6 स्तंभ चौड़ा था। यह पश्चिमी ग्रीस का सबसे बड़ा मंदिर था। इसकी छत सफेद पेंटेलिक संगमरमर (Pentelic Marble) से बनी थी जो दूर से चमकती थी। मंदिर के बाहरी त्रिकोणाकार हिस्सों (Pediments) पर ग्रीक पौराणिक कथाओं के दृश्य उकेरे गए थे।
पूर्वी पेडिमेंट पर ओएनोमास और पेलोप्स की रथ-दौड़ का दृश्य था। पश्चिमी पेडिमेंट पर लैपिथ और सेंटॉर की लड़ाई का दृश्य था। मंदिर के आंतरिक हॉल (Cella) में मूर्ति के लिए पर्याप्त जगह बनाई गई थी।
लेकिन जब मंदिर पूरा हुआ तो ओलंपिया के संरक्षकों को लगा कि मंदिर भव्य तो है लेकिन इसके अंदर ज़ीउस की कोई मूर्ति नहीं है जो इस भव्यता के योग्य हो। तब उन्होंने उस कलाकार को बुलाया जो पूरे ग्रीस में सबसे महान मूर्तिकार था।
फ़िडियास: वह कलाकार जिसे देवता ने खुद चुना
फ़िडियास (Phidias) या फ़ेइडियास (Pheidias) पाँचवीं सदी ईसा पूर्व के सबसे महान यूनानी मूर्तिकार, चित्रकार और वास्तुकार थे। उनका जन्म एथेंस में हुआ था और वे 465 से 425 ईसा पूर्व के बीच सक्रिय रहे।
फ़िडियास की महानता इस बात से समझी जा सकती है कि उन्हें दो बार देवताओं की महान मूर्तियाँ बनाने का काम सौंपा गया।
पहला काम था एथेंस के पार्थेनन में “एथेना पार्थेनोस” (Athena Parthenos) की विशाल मूर्ति। यह 447 से 432 ईसा पूर्व के बीच बनी। यह भी हाथीदाँत और सोने से बनी एक महाकाय मूर्ति थी।
दूसरा और अंतिम महान काम था ओलंपिया में ज़ीउस की मूर्ति।
एथेंस का विवाद और ओलंपिया का आगमन
एक रोचक ऐतिहासिक कहानी है कि फ़िडियास ओलंपिया इसलिए आए क्योंकि एथेंस में उनके खिलाफ एक मुकदमा चल रहा था।
एथेना की मूर्ति बनाते समय उन पर दो आरोप लगे। पहला आरोप था कि उन्होंने मूर्ति के सोने का कुछ हिस्सा हड़प लिया। दूसरा आरोप था कि उन्होंने एथेना की ढाल पर एक छोटी सी आकृति में अपना चेहरा उकेरा था जो एक बहुत बड़ा घमंड का काम माना गया।
फ़िडियास ने सोने की चोरी के आरोप का खंडन इस तरह किया। उन्होंने मूर्ति से सारी सोने की परतें उतरवा दीं और तोलवाईं। सोना पूरा निकला। लेकिन खुद की आकृति उकेरने का आरोप उन पर बना रहा।
इतिहासकार प्लूटार्क (Plutarch) ने लिखा कि फ़िडियास को जेल में डाल दिया गया जहाँ वे बीमारी से मर गए।
लेकिन एक और सिद्धांत है। ओलंपिया में उनकी कार्यशाला की खोज 1954 में हुई और उसमें मिले औजार और सामग्री का काल-निर्धारण (Dating) बताता है कि वे 430 ईसा पूर्व के आसपास वहाँ काम कर रहे थे। यानी एथेंस के विवाद के बाद वे ओलंपिया आए और यहाँ ज़ीउस की मूर्ति बनाई।
एलिस के अधिकारियों ने फ़िडियास को आमंत्रित किया था। वे चाहते थे कि उनके नव-निर्मित मंदिर में एक ऐसी मूर्ति हो जो पूरी दुनिया को चकित कर दे।
कार्यशाला का रहस्य: वह प्याला जिसने इतिहास को बदल दिया
ओलंपिया में ज़ीउस के मंदिर के पश्चिम में एक इमारत थी जिसे “फ़िडियास की कार्यशाला” (Workshop of Phidias) कहते हैं।
यह इमारत 32 मीटर लंबी, 18 मीटर चौड़ी और 14.5 मीटर ऊँची थी। और यह माप बिल्कुल वैसी ही थी जैसी मंदिर के अंदर ज़ीउस की मूर्ति के लिए बनाए गए हॉल (Cella) की थी।
यह जानबूझकर किया गया था। फ़िडियास यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि जो मूर्ति वे कार्यशाला में बना रहे हैं वह मंदिर में ठीक-ठीक फिट हो। कार्यशाला में मूर्ति बनाओ, फिर उसे मंदिर में स्थापित करो।
5वीं सदी ईस्वी में इस कार्यशाला को एक प्रारंभिक ईसाई बेसिलिका (Paleo-Christian Basilica) में बदल दिया गया। यह बेसिलिका 551 ईस्वी के एक भूकंप में नष्ट हो गई।
1954 से 1958 के बीच खुदाई में जो मिला वह अद्भुत था:
हाथीदाँत के टुकड़े, सोने के काम के औजार, काँच और कीमती पत्थर, मूर्ति के वस्त्र बनाने के लिए उपयोग की गई मिट्टी की साँचें (Terracotta Moulds) और ऐसी बहुत सी चीजें मिलीं जो बताती थीं कि यहाँ एक बड़ी और जटिल मूर्ति बनाई गई थी।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण खोज थी एक छोटा काँच का प्याला जिसके तले पर लिखा था:
“ΦΕΙΔΙΟΥ ΕΙΜΙ”
जिसका अर्थ है: “मैं फ़िडियास का हूँ।”
इस एक वाक्य ने पुष्टि कर दी कि यह वही कार्यशाला है जहाँ फ़िडियास ने काम किया था।
मूर्ति कैसी थी? उस स्वर्णिम दिव्यता का विवरण
ज़ीउस की मूर्ति के बारे में हमारा ज्ञान मुख्यतः तीन स्रोतों से आता है।
पहला स्रोत है पॉसानियास (Pausanias) का विवरण। वे दूसरी सदी ईस्वी के यूनानी यात्री और लेखक थे। उन्होंने मूर्ति देखी थी और उसका विस्तृत वर्णन अपनी पुस्तक “ग्रीस का वर्णन” (Description of Greece) में किया।
दूसरा स्रोत है प्राचीन सिक्के और रत्नाभूषण जिन पर मूर्ति की छाप थी।
तीसरा स्रोत है अन्य प्राचीन लेखकों जैसे स्ट्राबो, डायोडोरस और प्लिनी का उल्लेख।
मूर्ति का आकार: जब देवता छत से टकराता था
मूर्ति की ऊँचाई लगभग 12 से 13 मीटर (40 से 43 फीट) थी। यह एक 4 मंजिला इमारत जितनी ऊँची थी।
यूनानी भूगोलविद स्ट्राबो ने लिखा: “यद्यपि मंदिर बहुत बड़ा है, मूर्तिकार की कला में एक दोष है। उन्होंने देवता को बैठे हुए दिखाया है लेकिन सिर लगभग छत को छू रहा है। इससे यह आभास होता है कि अगर ज़ीउस खड़े होकर सीधे हों तो वे मंदिर की छत उखाड़ देंगे।”
यह वर्णन एक साथ कई भावनाएं जगाता है। यह मूर्ति की विशालता बताता है लेकिन साथ ही यह भी बताता है कि फ़िडियास जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं। ज़ीउस इतना बड़ा था कि कोई भी मंदिर उसे पूरी तरह समेट नहीं सकता।
क्राइसेलिफेनटाइन तकनीक: हाथीदाँत और सोने का अद्भुत संगम
मूर्ति को “क्राइसेलिफेनटाइन” (Chryselephantine) तकनीक से बनाया गया था। यह यूनानी शब्द “क्रायसोस” (chrysos) यानी सोना और “एलिफास” (elephas) यानी हाथीदाँत से बना है।
इस तकनीक में पहले एक विशाल लकड़ी का ढाँचा (wooden framework) बनाया जाता था जो मूर्ति की आत्मा होती थी। फिर इस ढाँचे पर हाथीदाँत की पतली परतें चिपकाई जाती थीं जो देवता की त्वचा को दर्शाती थीं। और ढाँचे के जिन हिस्सों पर कपड़े या आभूषण दिखाने थे, वहाँ सोने की पत्तियाँ और परतें लगाई जाती थीं।
यह तकनीक अत्यंत जटिल, समय लेने वाली और महंगी थी। इसीलिए यह केवल सबसे महत्वपूर्ण मंदिरों में सबसे पवित्र मूर्तियों के लिए उपयोग होती थी।
फ़िडियास इस तकनीक के सबसे बड़े उस्ताद थे।
मूर्ति का विस्तृत विवरण: पॉसानियास की आँखों से
पॉसानियास ने जो देखा उसका वर्णन इस प्रकार है:
ज़ीउस का मुख और शरीर: ज़ीउस को दाढ़ी के साथ और भव्य गरिमा में दिखाया गया था। उनके सिर पर जैतून की पत्तियों की माला (Olive Wreath) थी जो ओलंपिक विजेताओं को भी मिलती थी।
दाहिना हाथ: इसमें नाइकी (Nike) यानी जीत की पंखदार देवी की एक छोटी मूर्ति थी। नाइकी स्वयं हाथीदाँत और सोने से बनी थी।
बायाँ हाथ: इसमें एक राजदंड (Scepter) था जो विभिन्न बहुमूल्य धातुओं से बना था। राजदंड के शीर्ष पर एक बाज (Eagle) बैठा था।
वस्त्र: ज़ीउस के वस्त्र सोने की परतों से बने थे और उन पर फूल-पत्तियों और विभिन्न जानवरों की नक्काशी थी।
सिंहासन: यह ओलंपिया में ज़ीउस की मूर्ति का सबसे अलंकृत हिस्सा था।
सिंहासन देवदार की लकड़ी (Cedarwood) से बना था। इसे आबनूस (Ebony), हाथीदाँत, सोना और कीमती पत्थर से सजाया गया था। सिंहासन के पैरों पर “नाइकी” की नृत्य करती आकृतियाँ थीं।
सिंहासन पर अनेक पौराणिक दृश्य उकेरे गए थे जिनमें शामिल थे: अपोलो और आर्टेमिस, एफ्रोडाइट का जन्म, थेब्स के बच्चों को निगलते स्फिंक्स और ऐमेजोनोमैकी (ऐमेज़ॉन योद्धाओं की लड़ाई) के दृश्य।
पायदान (Footstool): ज़ीउस के सोने से बने चप्पलों के नीचे एक पायदान था जिस पर सोने में ऐमेजोनोमैकी के दृश्य बने थे।
सिंहासन के पाए: सिंहासन के चार पायों पर “थेब्स की विजय” के दृश्य चित्रित थे।
सिंहासन के नीचे का मार्ग: सिंहासन के नीचे से गुजरने वाला मार्ग चित्रित पर्दों से ढका था।
आधार और उसके सामने का जादुई दृश्य
मूर्ति एक तीन फीट ऊँचे काले एलुसिनियन संगमरमर के आधार पर खड़ी थी।
आधार के सामने एक उथला तालाब (Reflecting Pool) बनाया गया था जिसमें जैतून का तेल (Olive Oil) भरा था। यह पानी नहीं था। इसके दो उद्देश्य थे।
पहला उद्देश्य था संरक्षण। ओलंपिया का वातावरण नम (marshland) था और यह नमी हाथीदाँत के लिए हानिकारक थी। जैतून के तेल की नमी से हाथीदाँत सुरक्षित रहता था। वास्तव में मूर्ति को नियमित रूप से जैतून के तेल से लेपित किया जाता था।
दूसरा उद्देश्य था सौंदर्य। तेल की सतह पर मूर्ति का प्रतिबिंब पड़ता था जो मूर्ति को और भी विशाल और दिव्य दिखाता था।
शोधकर्ता राशना तरापोरवाला (Rashna Taraporewalla) के अनुसार यह तेल का तालाब एक परावर्तक दर्पण की तरह काम करता था जो मूर्ति की दृश्य प्रभाव को बहुगुणित करता था।
पेंटारकेस: वह रहस्यमय नाम जो ज़ीउस की उँगली पर उकेरा गया
पॉसानियास ने एक और रोचक बात लिखी। उनके अनुसार फ़िडियास ने ज़ीउस की छोटी उँगली पर यूनानी में “पेंटारकेस कालोस” (Pantarkes kalos) यानी “पेंटारकेस सुंदर है” लिखवाया था।
पेंटारकेस (Pantarkes) एक युवा एलिस के पहलवान थे जिन्होंने 86वें ओलंपियाड में लड़कों की कुश्ती में जीत हासिल की थी। कहा जाता है कि वे फ़िडियास के प्रिय शिष्य और साथी थे।
फ़िडियास ने पेंटारकेस को अमर बनाने के दो तरीके खोजे। एक तो उँगली पर नाम उकेरा। दूसरे मूर्ति के पायदान पर अपने को माला पहनाते हुए एक बालक की आकृति बनाई जो पेंटारकेस से मिलती-जुलती थी।
देवता का संदेश: क्या ज़ीउस ने मूर्ति को स्वीकार किया?
एक अद्भुत पौराणिक कथा यह है कि जब फ़िडियास ने मूर्ति पूरी की तो उन्होंने ज़ीउस से प्रार्थना की कि यदि उनका काम देवता को पसंद आया हो तो कोई संकेत दें।
पॉसानियास ने लिखा कि तुरंत ही मंदिर के फर्श पर बिजली गिरी जिसे ज़ीउस की स्वीकृति का संकेत माना गया।
फर्श पर उस बिजली के गिरने का स्थान काँसे के एक बर्तन से चिह्नित किया गया।
यह कहानी सच हो या न हो, यह बताती है कि फ़िडियास का काम इतना प्रभावशाली था कि लोगों को उसमें दैवीय उपस्थिति का अनुभव होता था।
मूर्ति का अनुभव: एक तीर्थयात्री की आँखों से
अब कल्पना कीजिए कि आप पाँचवीं सदी ईसा पूर्व के एक यूनानी नागरिक हैं। आप ओलंपिया की यात्रा पर हैं। ओलंपिक खेल देखने आए हैं।
मंदिर के प्रवेश द्वार पर आप रुकते हैं। बाहर से मंदिर की सफेद संगमरमर की छत धूप में चमक रही है। मंदिर के बाहरी हिस्से पर बनी नक्काशियाँ और रंग-बिरंगे चित्र आपको अंदर खींचते हैं।
आप अंदर जाते हैं। पहले आँखें अंधेरे में कुछ नहीं देख पातीं।
फिर धीरे-धीरे मंदिर के प्रवेश द्वार से आती रोशनी में एक आकार उभरता है।
हाथीदाँत की चमकती त्वचा। सोने की दमकती पोशाक। एक विशाल दाढ़ी। शांत लेकिन तेजस्वी आँखें।
और वह इतनी ऊँचाई पर बैठा है कि उसका सिर लगभग छत को छूता है।
तेल के तालाब में उसका प्रतिबिंब पड़ रहा है। ऐसा लगता है जैसे दो ज़ीउस हों।
आपकी साँसें रुक जाती हैं।
यही वह अनुभव था जिसे हजारों साल तक हजारों लोगों ने महसूस किया। इसी अनुभव के बारे में रोमन सेनापति ऐमिलियस पॉलस ने कहा कि उन्हें लगा जैसे उन्होंने साक्षात ज़ीउस को देख लिया।
ओलंपिक खेल और ज़ीउस की मूर्ति: एक अटूट रिश्ता
776 ईसा पूर्व से 393 ईस्वी तक हर चार साल पर ओलंपिया में खेल होते थे। इन खेलों में पूरे ग्रीस से और बाद में पूरे भूमध्यसागरीय जगत से खिलाड़ी और दर्शक आते थे।
ज़ीउस की मूर्ति इन खेलों का केंद्र था।
खेलों की शुरुआत से पहले ज़ीउस को भेंट और बलि दी जाती थी। विजेताओं को ज़ीउस की मूर्ति के सामने जैतून की माला पहनाई जाती थी। मूर्ति की उपस्थिति खेलों को एक धार्मिक और आध्यात्मिक आयाम देती थी।
ओलंपिक खेलों में भाग लेने का अर्थ था ज़ीउस के सम्मान में प्रतिस्पर्धा करना। और ज़ीउस की वह विशाल मूर्ति यह याद दिलाती थी कि सबसे बड़ा न्यायाधीश वही है।
रोमन सम्राट काइगुला (Caligula) ने एक बार मूर्ति को रोम ले जाने का आदेश दिया। लेकिन जब मचान बनाया गया तो अचानक जोर से हँसी की आवाज आई और मचान टूट गया। इस घटना को ज़ीउस के क्रोध का संकेत माना गया और मूर्ति वहीं रही।
मूर्ति की विरासत: जो प्रेरणाएं आज भी जीवित हैं
ज़ीउस की यह मूर्ति इतनी प्रसिद्ध थी कि इसने पूरी दुनिया की कला को प्रभावित किया।
यूनानी और रोमन कला में: यह मूर्ति बैठे हुए देवताओं की मानक छवि बन गई। इसके बाद से सभी प्रमुख देवताओं की मूर्तियाँ इसी मुद्रा में बनाई जाने लगीं। पूरे भूमध्यसागरीय जगत में सिक्कों पर, रत्नाभूषणों पर और मिट्टी के बर्तनों पर इस मूर्ति की छाप नजर आती थी।
लिंकन मेमोरियल: वाशिंगटन डी.सी. में “लिंकन मेमोरियल” की वह प्रसिद्ध मूर्ति जिसमें अब्राहम लिंकन सिंहासन पर बैठे दिखते हैं, उसके डिज़ाइन पर सीधे ओलंपिया के ज़ीउस का प्रभाव था। मूर्तिकार डेनियल चेस्टर फ्रेंच (Daniel Chester French) ने खुद यह स्वीकार किया था।
ज्यूपिटर की रोमन मूर्तियाँ: रोमन साम्राज्य में ज्यूपिटर की मूर्तियाँ इसी ओलंपिक ज़ीउस से प्रेरित थीं।
ईसाई कला: कुछ कला इतिहासकार मानते हैं कि ईसाई धर्म में “परमपिता परमेश्वर” (God the Father) की जो परंपरागत छवि है, जिसमें एक बुज़ुर्ग दाढ़ीदार आकृति बादलों पर विराजमान है, उस पर भी फ़िडियास के ज़ीउस का प्रभाव है।
मूर्ति का अंत: वह रहस्य जो आज भी अनसुलझा है
391 ईस्वी में रोमन सम्राट थियोडोसियस प्रथम (Theodosius I) ने ईसाई धर्म को साम्राज्य का एकमात्र धर्म घोषित किया और सभी “पगान” मंदिरों और अभयारण्यों को बंद करने का आदेश दिया।
393 ईस्वी में ओलंपिक खेल बंद हो गए। 426 ईस्वी में ज़ीउस के मंदिर को आधिकारिक रूप से बंद कर दिया गया।
मूर्ति का क्या हुआ? इस पर दो परस्पर विरोधी कहानियाँ हैं।
पहली कहानी: मूर्ति को कॉन्स्टेंटिनोपल (Constantinople) यानी आज के इस्तांबुल ले जाया गया। वहाँ इसे “लॉसस के महल” (Palace of Lausus) में रखा गया जो एक प्रसिद्ध कला-संग्रह था। इस संग्रह में अन्य अजूबों की वस्तुएं भी थीं। 475 ईस्वी में इस महल में भीषण आग लगी और मूर्ति नष्ट हो गई।
दूसरी कहानी: मूर्ति 426 ईस्वी में ओलंपिया के मंदिर के साथ ही जला दी गई या उसी समय नष्ट हो गई।
ब्रिटानिका के अनुसार “मंदिर 426 ईस्वी में नष्ट किया गया और मूर्ति तब नष्ट हो गई हो सकती है या लगभग 50 साल बाद कॉन्स्टेंटिनोपल में आग में।”
सच क्या है, आज तक पता नहीं। क्योंकि मूर्ति का कोई अवशेष कहीं नहीं मिला और कोई प्रति (replica) भी नहीं बनाई गई थी।
यह विडंबना है कि 800 साल तक दुनिया की सबसे प्रसिद्ध कलाकृति का आज एक भी अवशेष नहीं बचा।
ओलंपिया आज: खंडहर जो इतिहास की साँसें लेते हैं
551 ईस्वी के एक भीषण भूकंप ने ओलंपिया को लगभग पूरी तरह नष्ट कर दिया। बाढ़ और भूस्खलन से यह क्षेत्र मिट्टी में दब गया।
1766 में एक अंग्रेज पुरातत्वविद रिचर्ड चैंडलर (Richard Chandler) ने ओलंपिया की पहचान की। 1829 में फ्रांसीसी पुरातत्वविदों ने, फिर 1875 से जर्मन पुरातत्वविदों ने व्यवस्थित खुदाई शुरू की।
खुदाई में जो मिला वह इतिहास का अमूल्य खजाना था। ज़ीउस के मंदिर के विशाल स्तंभ गिरे पड़े थे जो अब भी देखे जा सकते हैं। मंदिर की नक्काशियों के टुकड़े मिले जो अब ओलंपिया के पुरातत्व संग्रहालय में हैं। फ़िडियास की कार्यशाला के अवशेष और वह प्रसिद्ध प्याला मिला।
1989 में ओलंपिया के पुरातत्व स्थल को यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित किया गया।
आज ओलंपिया का पुरातत्व संग्रहालय (Archaeological Museum of Olympia) उन सभी खोजों को संरक्षित करता है जो इस महान सभ्यता की गवाही देती हैं।
ज़ीउस की मूर्ति के रोचक तथ्य
मूर्ति 800 से अधिक वर्षों तक दुनिया की सबसे प्रसिद्ध कलाकृति रही। इसकी कोई प्रति (replica) नहीं बनाई गई इसलिए हम इसे केवल वर्णनों से जानते हैं। इसे बनाने में आठ साल का समय लगा। मूर्ति को नियमित रूप से जैतून के तेल से लेपित किया जाता था। फ़िडियास का प्याला पुरातत्व की सबसे नाटकीय खोजों में से एक है। लिंकन मेमोरियल की मूर्ति इसी से प्रेरित थी। रोमन सम्राट काइगुला इसे रोम ले जाना चाहता था लेकिन विफल रहा। मूर्ति का अंत आज भी एक ऐतिहासिक रहस्य है।
ओलंपिया कैसे पहुँचें?
निकटतम शहर: पत्रास (Patras) जो ओलंपिया से लगभग 100 किलोमीटर दूर है।
एथेंस से: बस या ट्रेन से पिरगोस (Pyrgos) तक, फिर वहाँ से ओलंपिया।
मुख्य आकर्षण: ज़ीउस के मंदिर के खंडहर, हेरा का मंदिर, फ़िडियास की कार्यशाला के अवशेष, ओलंपिया का स्टेडियम जहाँ प्राचीन खेल होते थे और ओलंपिया का पुरातत्व संग्रहालय।
यात्रा सुझाव: ओलंपिया को ठीक से देखने के लिए पूरे दिन की जरूरत है। संग्रहालय पहले देखें ताकि मंदिर के खंडहर देखते समय पूरा संदर्भ समझ आए।
निष्कर्ष: जब शिल्पकार ने देवता को जन्म दिया
ओलंपिया में ज़ीउस की मूर्ति की कहानी केवल सोने और हाथीदाँत की कहानी नहीं है। यह उस मानवीय क्षमता की कहानी है जो साधारण सामग्री में असाधारण को जन्म देती है।
फ़िडियास ने हाथीदाँत और सोने में देवता को साकार किया। उन्होंने ऐसी मूर्ति बनाई जिसे देखकर एक रोमन सेनापति की आँखें भर आईं, एक यूनानी दार्शनिक ने कहा कि यह दुख मिटा देती है और एक रोमन लेखक ने इसे “अतुलनीय” कहा।
800 साल तक यह मूर्ति जीवित रही। फिर एक दिन काल ने उसे भी अपनी गोद में ले लिया।
लेकिन फ़िडियास का काम वास्तव में कभी मरा नहीं। वह वाशिंगटन के लिंकन मेमोरियल में जीवित है। वह पूरी दुनिया की उन अनगिनत मूर्तियों में जीवित है जो उससे प्रेरित हुईं।
और सबसे बड़ी बात, वह उन शब्दों में जीवित है जो पॉसानियास, स्ट्राबो, लिवी और अनगिनत अन्य लोगों ने लिखे। क्योंकि जिस कलाकृति ने इतने महान लेखकों को इतनी गहराई से छुआ, वह केवल पत्थर और धातु नहीं थी। वह कुछ और थी।
शायद फ़िडियास वाकई देवता के करीब पहुँच गए थे।
“फ़िडियास ने ज़ीउस के होमरिक स्वरूप को मूर्त रूप दे दिया।” “Pheidias moulded the Zeus of Homer.” — प्लूटार्क (Plutarch), पहली-दूसरी सदी ईस्वी
संदर्भ स्रोत: Wikipedia, World History Encyclopedia, Britannica, National Geographic, ArtNet News, Archaeology Magazine, AllThatsInteresting, The Travel Insiders, Ancient Olympia Museum, 7Wonders.org