प्राचीन विश्व के सात अजूबों में वह महाकाय मंदिर जो तीन बार बनाया गया, तीन बार नष्ट हुआ और आज केवल एक अकेले स्तंभ के रूप में अपनी महानता की याद दिलाता है
दूसरी सदी ईसा पूर्व का एक यूनानी कवि। उसने अपनी जिंदगी में बेबीलोन की ऊँची दीवारें देखी थीं, ज़ीउस की स्वर्णिम मूर्ति देखी थी, गीज़ा के पिरामिड देखे थे और बेबीलोन के झूलते बाग़ों की कहानियाँ सुनी थीं।
लेकिन जब उसने एफेसुस में आर्टेमिस का मंदिर देखा, तो उसकी लेखनी से निकले ये शब्द इतिहास में अमर हो गए:
“जब मैंने उस आर्टेमिस के घर को देखा जो बादलों तक उठा था, तो वे सब अजूबे अपनी चमक खो बैठे और मैंने कहा: सूरज ने कभी ओलंपस के अलावा इतनी भव्य कोई चीज नहीं देखी।”
यह थे साइडन के एन्टिपेटर (Antipater of Sidon), और उनके इन शब्दों ने तय कर दिया कि आर्टेमिस का मंदिर न केवल सात अजूबों में शामिल होगा, बल्कि उन सभी का सबसे बड़ा अजूबा होगा।
यह मंदिर तीन बार बना। तीन बार नष्ट हुआ। हर बार पिछले से अधिक भव्य। और आज इस महान स्थल पर केवल एक अकेला स्तंभ खड़ा है जो दलदल से घिरा है और जिसके ऊपर एक अकेली सारस ने घोंसला बनाया है।
लेकिन उस एक स्तंभ की छाया में भी 2,500 साल का इतिहास जीवित है।
आज हम उस इतिहास को परत दर परत उघाड़ेंगे।
एफेसुस: वह महान नगर जिसने आर्टेमिस के मंदिर को जन्म दिया
आर्टेमिस के मंदिर की कहानी एफेसुस (Ephesus) शहर की कहानी से अलग नहीं है।
एफेसुस आधुनिक तुर्की के पश्चिमी तट पर स्थित था। यह आज के सेलचुक (Selçuk) शहर के पास था जो आधुनिक इज़मिर (İzmir) से लगभग 75 किलोमीटर दक्षिण में है।
यह नगर एशिया माइनर (Asia Minor) यानी आधुनिक अनातोलिया के सबसे महत्वपूर्ण शहरों में से एक था। एफेसुस भूमध्यसागरीय व्यापार का एक बड़ा केंद्र था। यहाँ का बंदरगाह व्यस्त रहता था और यहाँ से पूर्व और पश्चिम के बीच माल का आदान-प्रदान होता था।
एफेसुस की स्थापना के बारे में एक पौराणिक कथा है कि इसे एथेंस के राजकुमार आंड्रोक्लोस (Androklos) ने 10वीं सदी ईसा पूर्व में बसाया था। एक और किंवदंती कहती है कि इसे अमेजोन योद्धा स्त्रियों (Amazons) ने बसाया था और आर्टेमिस की पूजा उन्हीं ने शुरू की थी।
पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार इस क्षेत्र में मानव बसावट कांस्य युग (Bronze Age) से है। और यहाँ देवी की पूजा उस काल से हो रही थी जब यूनानी सभ्यता अभी जन्म भी नहीं ली थी।
एफेसुस ने अनेक शासकों को झेला। लिडियाई, फारसी, सेल्यूसिड, पेर्गामन, रोमन और अंत में बीजान्टिन साम्राज्य तक ने इस नगर पर राज किया। लेकिन हर शासक ने, चाहे वह कोई भी रहा हो, आर्टेमिस के मंदिर का सम्मान किया।
आर्टेमिस कौन थीं? दो रूप, एक देवी
आर्टेमिस के मंदिर की कहानी जाननी है तो पहले आर्टेमिस को जानना होगा। और यहाँ एक दिलचस्प बात है: एफेसुस की आर्टेमिस और यूनानी पौराणिक कथाओं की आर्टेमिस में बहुत अंतर था।
यूनानी आर्टेमिस
यूनानी पौराणिक कथाओं में आर्टेमिस देवराज ज़ीउस और लेतो (Leto) की पुत्री थीं। वे अपोलो की जुड़वाँ बहन थीं।
यूनानी आर्टेमिस शिकार, जंगल, जानवरों और कौमार्य की देवी थीं। वे सदा चाँद की देवी भी मानी जाती थीं। उनके हाथ में धनुष-बाण था और वे जंगल में हिरणों के साथ घूमती थीं। उन्हें अपोलो की तरह ही चाँदी के तीर चलाने वाली बताया जाता था।
रोमन पौराणिक कथाओं में उनका समकक्ष “डायना” (Diana) है।
एफेसुस की आर्टेमिस: एक अलग देवी
लेकिन एफेसुस की आर्टेमिस यूनानी आर्टेमिस से बिल्कुल अलग थीं। वे अनातोलिया की प्राचीन मातृ देवी “साइबेले” (Cybele) की उत्तराधिकारी थीं।
एफेसुस की आर्टेमिस प्रजनन शक्ति, मातृत्व और शहर की संरक्षक थीं। उनकी मूर्ति का वर्णन पढ़ने पर चकित रह जाएंगे।
उनके वक्षस्थल पर अनेक स्तन थे जो प्रचुरता और पोषण का प्रतीक थे। उनके शरीर के निचले हिस्से को बैलों, हिरणों, सिंहों और ग्रिफिन जैसे प्राणियों से सुसज्जित दिखाया गया था। उनके दोनों हाथ सर्पों से बनी लाठियों पर टिके थे। उनके सिर पर नगर की दीवारों जैसा मुकुट था।
यह छवि किसी यूनानी देवी की नहीं, बल्कि एक बहुत प्राचीन अनातोलिया की जीवन-देवी की थी।
जब यूनानी एफेसुस आए, तो उन्होंने इस देवी को अपनी आर्टेमिस के साथ जोड़ दिया। लेकिन एफेसुस की आर्टेमिस की आत्मा हमेशा वही रही जो वह थी। यही कारण था कि जब ईसाई धर्म का उदय हुआ तो आर्टेमिस की भक्ति को खत्म करने में बहुत संघर्ष करना पड़ा।
पहला मंदिर: जब पूजा की पहली ईंट रखी गई
आर्टेमिस के पूजा-स्थल का इतिहास मंदिर से बहुत पहले शुरू होता है।
पुरातत्वविद इस स्थल पर मानव धार्मिक गतिविधि के प्रमाण कांस्य युग से पाते हैं। यहाँ खुदाई में मिले “आर्टेमिसियन जमा” (Artemision Deposit) में 1,000 से अधिक वस्तुएं मिली थीं जिनमें इलेक्ट्रम (electrum) यानी सोने-चाँदी के मिश्रण से बने दुनिया के सबसे पुराने सिक्के शामिल थे। ये सिक्के 625-600 ईसा पूर्व के हैं।
8वीं सदी ईसा पूर्व में इस स्थल पर एक प्रारंभिक मंदिर बनाया गया। यह शायद दुनिया के पहले “पेरिप्तेरल” (Peripteral) मंदिरों में से एक था यानी ऐसा मंदिर जो चारों तरफ से स्तंभों से घिरा हो।
7वीं सदी ईसा पूर्व में एक भीषण बाढ़ ने इस मंदिर को नष्ट कर दिया।
लेकिन आर्टेमिस की भक्ति इतनी गहरी थी कि एफेसुस के लोगों ने तुरंत फिर से निर्माण शुरू किया।
दूसरा मंदिर: क्रोइसस का उपहार और एक महान इमारत का जन्म
वह मंदिर जो प्राचीन विश्व के सात अजूबों में शामिल हुआ, उसकी नींव लगभग 550 ईसा पूर्व में रखी गई।
क्रोइसस: वह राजा जिसका नाम धन का पर्याय बन गया
इस महान मंदिर के निर्माण का श्रेय जाता है लिडिया के राजा क्रोइसस (Croesus of Lydia) को। क्रोइसस का नाम इतिहास में अकल्पनीय धन का पर्याय बन गया है। अंग्रेजी में आज भी कहते हैं “rich as Croesus” यानी क्रोइसस जितना अमीर।
क्रोइसस ने 560 से 546 ईसा पूर्व तक शासन किया। उन्होंने एफेसुस को जीता और फिर एफेसियों के साथ एक समझौता किया।
यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस (Herodotus) ने लिखा कि एफेसियों ने लिडियाई आक्रमण से बचने के लिए अपने पुराने मंदिर से लेकर शहर की दीवारों तक 1,243 मीटर (4,081 फीट) लंबी एक रस्सी खींची और इस तरह पूरे शहर को आर्टेमिस को समर्पित कर दिया। उन्हें उम्मीद थी कि इससे देवी उनकी रक्षा करेगी। लेकिन यह काम नहीं आया।
क्रोइसस ने एफेसुस को जीतने के बाद मंदिर के लिए दान दिया। पुरातत्वविदों को एक स्तंभ की बुनियाद पर यह शिलालेख मिला: “क्रोइसस ने यह समर्पित किया।” यह एफेसुस में उनके योगदान का ठोस पुरातात्विक प्रमाण है।
चेर्सीफ्रोन: वह क्रेटन वास्तुकार जिसने असंभव को संभव किया
मंदिर के मुख्य वास्तुकार थे क्रेते (Crete) के चेर्सीफ्रोन (Chersiphron)। उनके साथ उनके पुत्र मेटागेन्स (Metagenes) भी थे।
इस पिता-पुत्र की जोड़ी ने मंदिर को इतना बड़ा बनाने की कल्पना की जो पहले कभी नहीं हुई थी।
लेकिन निर्माण में एक बड़ी समस्या थी। मंदिर का निर्माण स्थल दलदली जमीन पर था।
प्लिनी द एल्डर (Pliny the Elder) ने लिखा कि वास्तुकारों ने यह जानबूझकर चुना। उनका तर्क था कि भूकंप की स्थिति में दलदली जमीन एक कुशन की तरह काम करेगी और मंदिर को कम नुकसान होगा। मंदिर की नींव में भेड़ की ऊन (fleeces) और कुटे हुए कोयले (pounded charcoal) की परतें बिछाई गईं जो एक प्राचीन किंतु प्रभावशाली भूकंपरोधी तकनीक थी।
निर्माण में लगभग 120 वर्ष का समय लगा। यह पूरी तरह संगमरमर से बना था। यह इतिहास का पहला ग्रीक मंदिर था जो पूरी तरह संगमरमर से बना था।
मंदिर के आयाम:
लंबाई लगभग 110 मीटर (360 फीट), चौड़ाई लगभग 55 मीटर (180 फीट) थी। यह पार्थेनन से दोगुने आकार का था। मंदिर में 36 से अधिक विशेष स्तंभ थे जिनकी बुनियाद पर नक्काशीदार उभार (bas-reliefs) बने थे।
इन स्तंभों को “columnae caelatae” यानी “नक्काशीदार स्तंभ” कहा जाता था और ये इस मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता थी।
इस मंदिर ने 600 वर्षों तक एफेसुस की शान बढ़ाई। और फिर एक रात सब बदल गया।
हेरोस्ट्रेटस: वह पागल आगजनी जिसने अमरता के लिए मंदिर जलाया
21 जुलाई, 356 ईसा पूर्व की रात।
यह तारीख इतिहास में दो कारणों से दर्ज है।
पहला कारण: इसी रात सिकंदर महान (Alexander the Great) का जन्म हुआ।
दूसरा कारण: इसी रात एक व्यक्ति ने आर्टेमिस के महान मंदिर में आग लगा दी।
वह व्यक्ति था हेरोस्ट्रेटस (Herostratus)। वह एफेसुस का एक साधारण नागरिक था जिसके पास न धन था, न सत्ता, न कोई प्रतिभा। लेकिन उसकी एक जिद थी: वह इतिहास में याद रखा जाना चाहता था। और उसे लगा कि इतिहास में याद रहने का सबसे आसान तरीका है सबसे बड़ी चीज को नष्ट कर देना।
उसने रात के अंधेरे में मंदिर में घुसकर आग लगा दी। मंदिर के भीतर की लकड़ी की संरचनाएं, पर्दे और सजावटी सामान जल उठे। तब तक हुई क्षति अपूरणीय थी।
हेरोस्ट्रेटस को पकड़ा गया। यातनाओं के बाद उसने अपना अपराध कबूल किया और अपना मकसद भी बताया। एफेसुस के अधिकारियों ने उसे मृत्युदंड दिया और साथ ही एक आदेश जारी किया कि उसका नाम कभी नहीं लिया जाएगा।
लेकिन इतिहास की विडंबना देखिए। यूनानी इतिहासकार थियोपोम्पस (Theopompus) ने उसका नाम अपने लेखन में दर्ज किया और वह नाम आज भी जीवित है।
हेरोस्ट्रेटस आज भी याद किया जाता है, ठीक उस अर्थ में जो वह चाहता था। इतिहास में एक ऐसे नाम के रूप में जो बर्बरता, महत्वाकांक्षा और पागलपन का प्रतीक है।
वह किंवदंती जो पुश्त-दर-पुश्त सुनाई गई
प्लूटार्क ने लिखा: “जिस रात मंदिर जला, उसी रात आर्टेमिस सिकंदर की देखभाल में व्यस्त थीं इसलिए वे अपना मंदिर नहीं बचा सकीं।”
और पारसी ज्योतिषियों ने सिकंदर के जन्म और मंदिर के जलने की एक साथ भविष्यवाणी की थी जिसे उन्होंने “एशिया के पतन का शगुन” बताया था।
सिकंदर का प्रस्ताव और एफेसियों का अद्भुत उत्तर
334 ईसा पूर्व में जब सिकंदर महान एफेसुस आए तो मंदिर का पुनर्निर्माण अभी चल रहा था।
सिकंदर ने एक उदार प्रस्ताव दिया: वे मंदिर के निर्माण का पूरा खर्च उठाएंगे लेकिन बदले में मंदिर के शिलालेख पर उनका नाम लिखा जाए।
यह एक असाधारण प्रस्ताव था। सिकंदर उस समय तक एशिया माइनर के विजेता बन चुके थे और उनकी शक्ति से इनकार करने की हिम्मत कम ही लोग रखते थे।
लेकिन एफेसियों ने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।
स्ट्राबो ने लिखा कि एफेसुस के एक अनाम व्यक्ति ने सिकंदर से बड़ी चतुरता से कहा: “एक देवता के लिए उचित नहीं कि वह किसी दूसरे देवता को उपहार दे।”
इस प्रकार सिकंदर को देवता बताकर उनकी बात को सम्मानपूर्वक किंतु दृढ़ता से अस्वीकार कर दिया गया।
सिकंदर के जाने के बाद एफेसियों ने खुद पैसे जुटाए। महिलाओं ने अपने गहने दान किए। व्यापारियों ने धन दिया। और पूरा शहर मिलकर अपनी देवी के मंदिर का निर्माण करने लगा।
यह एक राष्ट्रीय आंदोलन था, एक सामूहिक प्रेम का प्रदर्शन।
तीसरा और महानतम मंदिर: वह इमारत जो सातों अजूबों से महान थी
323 ईसा पूर्व तक, यानी सिकंदर की मृत्यु के वर्ष तक, नए मंदिर का निर्माण पूरा हो गया।
यह मंदिर पिछले मंदिर से भी अधिक भव्य और विशाल था। इसकी विशेषताएं:
आयाम: लंबाई लगभग 137 मीटर (450 फीट), चौड़ाई लगभग 69 मीटर (225 फीट)। यह पूरी तरह संगमरमर से बना था।
स्तंभ: मंदिर में 127 स्तंभ थे जिनमें से प्रत्येक की ऊँचाई 17.5 से 20 मीटर (60 फीट) थी। इनमें से 36 विशेष स्तंभों की बुनियाद पर जीवन आकार के उभरे हुए चित्र (Columnae Caelatae) तराशे गए थे।
स्तंभों की व्यवस्था: मंदिर के सामने 8 स्तंभ, पीछे 9 स्तंभ और प्रत्येक भुजा पर 21 स्तंभ थे। यह संख्या असामान्य थी और जानबूझकर चुनी गई थी।
पेडिमेंट: मंदिर के पेडिमेंट में तीन असामान्य उद्घाटन थे। पुरातत्वविदों का मानना है कि ये चाँद की रोशनी को अंदर आने देने के लिए बने थे। आर्टेमिस चाँद की भी देवी थीं और उनकी पूजा में चाँद की रोशनी का विशेष महत्व था।
मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ: इस मंदिर को सजाने के लिए प्राचीन यूनान के सबसे महान कलाकारों को बुलाया गया था।
पॉलीक्लाइटस (Polyclitus), फ़िडियास (Pheidias), क्रेसिलास (Cresilas), फ्राडमोन (Phradmon) और स्कोपास (Scopas) जैसे महान मूर्तिकारों ने यहाँ काम किया। ये नाम उस युग की कला के सर्वोच्च प्रतिभाओं के थे।
अमेजोन की मूर्तियाँ: मंदिर में अनेक मूर्तियाँ थीं जो अमेजोन योद्धा स्त्रियों को दर्शाती थीं। किंवदंती के अनुसार एफेसुस की स्थापना इन्हीं अमेजोन ने की थी।
सोने-चाँदी से मढ़े स्तंभ: मंदिर के कुछ स्तंभ सोने और चाँदी से अलंकृत थे।
रंग-बिरंगे चित्र: मंदिर की दीवारों पर जीवंत चित्रकारी थी।
आर्टेमिस की मूर्ति: मंदिर के केंद्र में आर्टेमिस की एक विशाल मूर्ति थी जो बाद में एफेसुस संग्रहालय में रखी गई।
1,000 से अधिक धार्मिक वस्तुएं: मंदिर में मूर्तियाँ, स्तंभ, शिलाएं और सजावटी वस्तुएं थीं जो विभिन्न शासकों और भक्तों ने दान में दी थीं।
मंदिर का धार्मिक और आर्थिक महत्व: एक शहर का हृदय
आर्टेमिस का मंदिर केवल एक पूजाघर नहीं था। यह एफेसुस की जीवन-रेखा था।
तीर्थयात्रियों का आना
पूरे भूमध्यसागरीय जगत से तीर्थयात्री, व्यापारी, राजा, दार्शनिक और यात्री यहाँ आते थे। एफेसुस का बंदरगाह इन आगंतुकों से गुलजार रहता था।
जो लोग आते थे वे देवी को भेंट चढ़ाते थे। सोने के आभूषण, चाँदी की मूर्तियाँ, कीमती वस्त्र और अन्य बहुमूल्य वस्तुएं। मंदिर एक विशाल खजाने का घर था।
बैंक और शरण-स्थल
मंदिर एक बैंक की तरह भी काम करता था। लोग अपना धन और कीमती सामान यहाँ जमा करते थे क्योंकि देवी की छत्रछाया में रखा माल सुरक्षित माना जाता था।
मंदिर एक शरण-स्थल (Sanctuary) भी था। जो व्यक्ति यहाँ आ जाता था उसे मंदिर के भीतर गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था। यह एक प्राचीन “शरणागत-धर्म” की परंपरा थी।
चाँदी की मूर्तियाँ और स्थानीय अर्थव्यवस्था
मंदिर के इर्द-गिर्द चाँदीकार और मूर्तिकार की एक पूरी अर्थव्यवस्था चलती थी। तीर्थयात्री यहाँ आकर आर्टेमिस की छोटी-छोटी मूर्तियाँ और यादगार वस्तुएं खरीदते थे।
यह एफेसुस का सबसे बड़ा व्यापार था।
“मधुमक्खी के छत्ते” जैसा जीवंत परिसर
प्राचीन यूनानी लेखकों ने मंदिर परिसर को एक मधुमक्खी के छत्ते की उपमा दी। यहाँ हमेशा गतिविधि रहती थी।
पुजारी और पुजारिनें थे। संगीतकार थे। नर्तक थे। करतब दिखाने वाले थे। मंदिर की घुड़सवार पुलिस थी। व्यापारी थे। और हजारों श्रद्धालु थे।
प्लिनी द एल्डर के अनुसार “डायना की तरह रानी के साथ मधुमक्खियों के छत्ते की तरह मंदिर पुजारियों और पुजारिनों, संगीतकारों, नर्तकों और करतब-बाजों से घिरा रहता था।”
सिकंदर महान के बाद: बदलते शासक, अटल आस्था
323 ईसा पूर्व में सिकंदर की मृत्यु के बाद उनका साम्राज्य उनके सेनापतियों में बँट गया। एफेसुस सेल्यूसिड, पेर्गामन और अंत में रोमन साम्राज्य के अधीन आया।
129 ईसा पूर्व में एफेसुस रोमन प्रांत एशिया की राजधानी बन गया। और आर्टेमिस के मंदिर की महिमा और बढ़ गई।
रोमन शासन में एफेसुस भूमध्यसागरीय जगत के सबसे बड़े नगरों में से एक था। यहाँ की आबादी 2 से 5 लाख तक थी। यहाँ “सेल्सस की लाइब्रेरी” (Library of Celsus) जैसी महान इमारतें बनीं। और आर्टेमिस का मंदिर सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र बना रहा।
संत पॉल और दंगा: जब मंदिर को धर्म से चुनौती मिली
पहली सदी ईस्वी में एफेसुस इतिहास के एक और महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा था।
ईसाई धर्म के पहले प्रचारकों में से एक संत पॉल (Saint Paul) एफेसुस आए और यहाँ कुछ समय रहे। उन्होंने यहाँ ईसाई धर्म का प्रचार किया।
इससे एफेसुस में एक बड़ा संकट खड़ा हो गया।
नए नियम (New Testament) के “प्रेरितों के काम” (Acts of the Apostles) में एक रोचक घटना का वर्णन है।
डेमेट्रियस (Demetrius) नाम का एक चाँदीकार था जो आर्टेमिस की चाँदी की मंदिरनुमा मूर्तियाँ बनाकर बेचता था। जब लोगों ने पॉल की बातें सुनना शुरू किया तो उन्होंने मंदिर की मूर्तियाँ खरीदना कम कर दिया।
डेमेट्रियस के व्यवसाय को खतरा हुआ। उसने अन्य कारीगरों को भड़काया और कहा: “यह पॉल न केवल एफेसुस में, बल्कि लगभग पूरे एशिया में यह कह-कहकर लोगों को बहका रहा है कि हाथ के बनाए देवता देवता नहीं होते।”
यह एक बड़े दंगे में बदल गया। हजारों लोग “एफेसुस की आर्टेमिस महान है!” चिल्लाते हुए शहर के थिएटर में जमा हो गए। यह नारा दो घंटे तक गूँजता रहा।
अंततः नगर के एक अधिकारी ने भीड़ को शांत किया। लेकिन यह घटना बताती है कि आर्टेमिस की भक्ति एफेसुस की अर्थव्यवस्था और पहचान से कितनी गहराई से जुड़ी थी।
गोथिक आक्रमण: 262 ईस्वी की वह रात जब अमीर लुट गए
262 ईस्वी में एक बड़ी आपदा आई।
गोथ (Goths) नामक जर्मनिक जनजाति ने एफेसुस पर हमला किया और मंदिर को लूट लिया।
मंदिर की अधिकांश बेशकीमती कलाकृतियाँ, सोने-चाँदी की मूर्तियाँ और कीमती वस्तुएं लूट ली गईं।
स्ट्राबो ने जो भव्य मंदिर देखा था और जिसे एन्टिपेटर ने सभी अजूबों से महान बताया था, वह बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया।
मंदिर का चौथा पुनर्निर्माण आंशिक रूप से हुआ लेकिन अब वह पुरानी भव्यता नहीं रही।
थियोडोसियस और ईसाई भीड़: अंतिम विनाश
391 ईस्वी में रोमन सम्राट थियोडोसियस प्रथम (Theodosius I) ने ईसाई धर्म को रोमन साम्राज्य का एकमात्र धर्म घोषित किया और सभी “पगान” मंदिरों को बंद करने का आदेश दिया।
401 ईस्वी में एक ईसाई भीड़ ने आर्टेमिस के मंदिर पर हमला किया। उन्होंने मंदिर को ध्वस्त कर दिया।
इस बार कोई पुनर्निर्माण नहीं हुआ।
मंदिर के पत्थरों को नई इमारतों में इस्तेमाल किया गया। ऐसी मान्यता है कि कॉन्स्टेंटिनोपल की हागिया सोफिया (Hagia Sophia) में भी इसके कुछ स्तंभ लगाए गए, हालाँकि यह पूरी तरह सिद्ध नहीं हुआ।
और जो बचा वह धीरे-धीरे नदी की बाढ़ों की रेत और मिट्टी में दब गया।
1,000 से अधिक वर्षों तक यह स्थल अज्ञात रहा।
जॉन टर्टल वुड: वह खोजकर्ता जिसने 6 साल रेत खोदी
1863 में ब्रिटिश संग्रहालय (British Museum) ने एफेसुस में खुदाई के लिए एक अभियान प्रायोजित किया।
जॉन टर्टल वुड (John Turtle Wood) नाम के एक ब्रिटिश इंजीनियर को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। वे मूल रूप से एक रेलवे इंजीनियर थे लेकिन पुरातत्व उनका जुनून था।
वुड ने 6 साल तक खोज की। बार-बार मलेरिया से बीमार पड़े। कई बार लुटेरों के हमले झेले। धन समाप्त होने पर निजी कर्ज लिया।
1869 में, 6 साल की कठिन खोज के बाद, वुड को मंदिर की नींव के अवशेष मिले।
यह खोज लगभग 2,000 साल बाद हुई थी। मंदिर 6 मीटर मिट्टी के नीचे दबा था।
1874 तक खुदाई जारी रही। इसमें मिले अवशेष ब्रिटिश संग्रहालय ले जाए गए जहाँ आज भी “एफेसुस कक्ष” (Ephesus Room) में रखे हैं।
इनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं “columnae caelatae” यानी वे नक्काशीदार स्तंभ-बुनियाद जिन्हें स्कोपास ने तराशा था।
वास्तुकला की अनोखी विशेषताएं: जो इसे सबसे अलग बनाती थीं
आर्टेमिस का मंदिर अपने समय के अन्य यूनानी मंदिरों से कई मायनों में अलग था।
आयोनिक शैली में महाकाय आकार
मंदिर आयोनिक शैली (Ionic Order) में बना था जो डोरिक की तुलना में अधिक अलंकृत और सुंदर शैली है। लेकिन इसका आकार किसी भी अन्य आयोनिक मंदिर से कहीं अधिक विशाल था।
नक्काशीदार स्तंभ-बुनियाद
36 विशेष स्तंभों की बुनियाद पर जीवन-आकार की उभरी हुई नक्काशी थी। यह अन्य किसी मंदिर में नहीं थी। इन नक्काशियों में अमेजोन, ग्रीक देवता और पौराणिक दृश्य उकेरे गए थे।
तीन असामान्य पेडिमेंट छिद्र
पेडिमेंट में तीन छिद्र जो चाँद की रोशनी अंदर आने देते थे। यह आर्टेमिस की चाँद से संबद्धता का प्रतीक था।
दलदल पर नींव
भूकंपरोधी डिज़ाइन के रूप में दलदल पर निर्माण और ऊन और कोयले की परतें बिछाना। यह उस काल की एक असाधारण इंजीनियरिंग सोच थी।
पूरी तरह संगमरमर
यह इतिहास का पहला मंदिर था जो पूरी तरह संगमरमर से बना था।
आर्टेमिस के मंदिर और बाइबल
नए नियम में एफेसुस का कई बार उल्लेख है। संत पॉल ने एफेसियों के लिए एक “एफेसियों को पत्र” (Epistle to the Ephesians) लिखा जो बाइबल में शामिल है।
बाइबल की “प्रकाशितवाक्य” (Book of Revelation) में एफेसुस उन सात नगरों में से एक है जिन्हें पत्र लिखे गए।
संत जॉन (Saint John) के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने एफेसुस में रहकर “जॉन का सुसमाचार” (Gospel of John) लिखा।
इस तरह एक ही नगर में प्राचीन यूनानी धर्म का सबसे महान मंदिर और प्रारंभिक ईसाई धर्म के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक का अद्भुत मिलन हुआ।
आज का एफेसुस और मंदिर का स्थल
आज एफेसुस का पुरातत्व स्थल (Archaeological Site of Ephesus) तुर्की के सबसे महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों में से एक है। यहाँ की “मार्बल स्ट्रीट”, “सेल्सस लाइब्रेरी” और “ग्रेट थिएटर” देखने लाखों पर्यटक आते हैं।
लेकिन आर्टेमिस के मंदिर का स्थल आज एक दलदल के किनारे है। वहाँ केवल एक अकेला स्तंभ खड़ा है जिसे खुदाई में मिले टुकड़ों को जोड़कर बनाया गया है।
उस एकाकी स्तंभ के ऊपर अक्सर एक सारस (stork) घोंसला बनाता है।
और उस स्तंभ की छाया में वह दलदल है जहाँ कभी दुनिया की सबसे भव्य इमारत खड़ी थी।
ब्रिटिश संग्रहालय (British Museum) के “एफेसुस कक्ष” में नक्काशीदार स्तंभ-बुनियाद के टुकड़े, अमेजोन की मूर्तियाँ और अन्य पुरातात्विक वस्तुएं रखी हैं।
एफेसुस संग्रहालय (Ephesus Museum) में आर्टेमिस की मूल मूर्तियों की प्रतियाँ और रोमन काल की मूर्तियाँ देखी जा सकती हैं।
2022 में अहमत डेंकर (Ahmet Denker) के नेतृत्व में एक टीम ने मंदिर का 3D पुनर्निर्माण मॉडल तैयार किया जो यह दिखाता है कि मंदिर चौथी सदी ईसा पूर्व में कैसा दिखता था।
आर्टेमिस के मंदिर के रोचक तथ्य
यह प्राचीन विश्व के सात अजूबों में सबसे बड़ा मंदिर था। यह मंदिर तीन बार बना और तीन बार नष्ट हुआ। एन्टिपेटर ने इसे अन्य सभी अजूबों से महान बताया। यह इतिहास का पहला पूरी तरह संगमरमर से बना मंदिर था। मंदिर में 127 स्तंभ थे जिनमें से 36 पर जीवन-आकार की नक्काशी थी। सिकंदर महान ने इसके निर्माण में योगदान का प्रस्ताव दिया लेकिन अस्वीकार कर दिया गया। मंदिर को एक बैंक और शरण-स्थल के रूप में भी उपयोग किया जाता था। संत पॉल के प्रचार के कारण यहाँ एक बड़ा दंगा हुआ था। आज मंदिर स्थल पर केवल एक अकेला स्तंभ खड़ा है। खुदाई के अवशेष ब्रिटिश संग्रहालय में संरक्षित हैं।
एफेसुस और आर्टेमिस का मंदिर कैसे पहुँचें?
निकटतम शहर: सेलचुक (Selçuk), तुर्की। इज़मिर से लगभग 80 किलोमीटर दक्षिण में।
परिवहन: इज़मिर से बस या ट्रेन से सेलचुक। सेलचुक से एफेसुस और मंदिर स्थल तक पैदल या टैक्सी से।
मुख्य आकर्षण: एफेसुस का पुरातत्व स्थल, मंदिर स्थल पर अकेला स्तंभ, सेल्सस लाइब्रेरी, एफेसुस का ग्रेट थिएटर और एफेसुस संग्रहालय।
यात्रा सुझाव: एफेसुस संग्रहालय पहले देखें, फिर पुरातत्व स्थल। मंदिर का स्थल एफेसुस पुरातत्व स्थल से 2 किलोमीटर दूर है इसलिए अलग से जाना होगा।
निष्कर्ष: जो एक स्तंभ में सिमट गया, वह इतिहास में हमेशा के लिए फैल गया
आर्टेमिस के मंदिर की कहानी जितनी गौरवशाली है उतनी ही दुखद भी है।
एक महान देवी की पूजा हजारों साल पुरानी थी। उसके सम्मान में दुनिया का सबसे भव्य मंदिर बनाया गया। यह मंदिर तीन बार बना, तीन बार नष्ट हुआ। हर बार और अधिक भव्य होकर उठा।
लेकिन अंत में समय ने उसे भी अपने में समेट लिया।
आज उस महान स्थल पर एक अकेला स्तंभ खड़ा है। उसके ऊपर एक सारस का घोंसला है। चारों तरफ दलदल है।
लेकिन क्या वह मंदिर वाकई नष्ट हुआ?
नहीं।
वह उन शब्दों में जीवित है जो एन्टिपेटर ने लिखे थे, कि इसे देखकर बाकी सब अजूबे फीके पड़ गए। वह उन नक्काशीदार स्तंभों के टुकड़ों में जीवित है जो ब्रिटिश संग्रहालय में रखे हैं। वह उन लाखों तीर्थयात्रियों की स्मृतियों में जीवित है जो सदियों तक यहाँ आए और देवी के चरणों में अपनी आस्था अर्पित की।
और वह हम सबकी उस कल्पना में जीवित है जो उस एकाकी स्तंभ को देखकर पूछती है: “यह कभी कैसा रहा होगा?”
क्योंकि जो सवाल जगाए, वह कभी मरता नहीं।
“जब मैंने आर्टेमिस के उस घर को देखा जो बादलों तक उठा था, तो वे सब अजूबे अपनी चमक खो बैठे। सूरज ने कभी ओलंपस के अलावा इतनी भव्य कोई चीज नहीं देखी।” — साइडन के एन्टिपेटर (Antipater of Sidon), दूसरी सदी ईसा पूर्व
संदर्भ स्रोत: Wikipedia, World History Encyclopedia, Britannica, AllThatsInteresting, TheCollector, Archaeology Magazine, Through Eternity Tours, BestofEphesus, 7Wonders.org, National Geographic