प्राचीन विश्व के सात अजूबों में वह अंतिम और सबसे व्यावहारिक अजूबा जो केवल भव्यता का प्रतीक नहीं था बल्कि हजारों नाविकों की जान बचाने वाला एक जीवंत स्तंभ था, जिसने “फारोस” शब्द को दुनिया की दर्जनों भाषाओं में “रोशनीघर” का अर्थ दे दिया और जिसकी नींव आज भी समुद्र की गहराई में सोई है
तीसरी सदी ईसा पूर्व का एक अँधेरी रात का दृश्य।
भूमध्यसागर पर एक व्यापारी का जहाज। तूफानी हवाएं। ऊँची-ऊँची लहरें। और उत्तरी अफ्रीका का वह खतरनाक तट जो न दिखता था, न जानलेवा चट्टानों की चेतावनी देता था।
नाविक घबराए हुए थे। दिशा का कोई भरोसा नहीं था।
फिर अचानक क्षितिज पर एक रोशनी दिखी। दूर से, बहुत दूर से, एक जीवंत लौ जो न हवा से बुझती थी, न तूफान से काँपती थी।
वह रोशनी थी फारोस द्वीप का महान रोशनीघर यानी “ऐलेक्जेंड्रिया का रोशनीघर” (Lighthouse of Alexandria)।
उस रोशनी की दिशा में चलो और तुम सुरक्षित बंदरगाह पहुँच जाओगे। उससे मुँह मोड़ो और चट्टानें तुम्हारा जहाज चीर देंगी।
यह प्राचीन विश्व के सात अजूबों में सातवाँ और अंतिम अजूबा है। यह उन छह अजूबों से अलग था जो देवताओं की महिमा, राजाओं की महत्वाकांक्षा या प्रेम के लिए बने थे। यह बना था इंसानों की जान बचाने के लिए।
1,600 साल से अधिक समय तक यह टॉवर भूमध्यसागर के नाविकों का सबसे भरोसेमंद साथी था। इसकी रोशनी 50 किलोमीटर से अधिक दूर तक दिखती थी। और इसका नाम “फारोस” आज फ्रेंच, इतालवी, स्पेनिश, पुर्तगाली और दर्जनों अन्य भाषाओं में “रोशनीघर” का पर्याय है।
आज हम इस अद्भुत इंजीनियरिंग चमत्कार की पूरी कहानी जानेंगे।
ऐलेक्जेंड्रिया: वह महान नगर जिसने रोशनीघर को जन्म दिया
ऐलेक्जेंड्रिया के रोशनीघर की कहानी शुरू होती है ऐलेक्जेंड्रिया नगर की स्थापना से।
331 ईसा पूर्व में विश्व-विजेता सिकंदर महान (Alexander the Great) ने मिस्र में एक नए नगर की स्थापना की और इसे अपना नाम दिया। यह नगर नील नदी के डेल्टा के पश्चिमी सिरे पर, भूमध्यसागर के किनारे बसाया गया।
सिकंदर ने इस नगर की स्थापना के लिए स्थान बड़ी सोच-समझकर चुना था। यहाँ दो प्राकृतिक बंदरगाह थे जो व्यापार के लिए आदर्श थे। पूर्वी बंदरगाह “ग्रेट हार्बर” (Great Harbour) था और पश्चिमी बंदरगाह “यूनोस्टोस” (Eunostos) यानी “सुखद वापसी का बंदरगाह” था।
लेकिन एक बड़ी समस्या थी।
उत्तरी अफ्रीका का तट बेहद खतरनाक था। तट की भूमि इतनी समतल और नीची थी कि दूर से पहचानी नहीं जाती थी। पानी के नीचे चट्टानें और उथले रेतीले तट थे जो जहाजों को बिना किसी चेतावनी के चीर देते थे। रात के समय और खराब मौसम में यह तट एक घातक जाल था।
यूनानी इतिहासकार स्ट्राबो (Strabo) ने लिखा: “तट के दोनों ओर कोई बंदरगाह नहीं है, चट्टानें और उथले पानी हैं। खुले समुद्र से आने वाले नाविकों को बंदरगाह के मुहाने तक सही रास्ते से आने के लिए एक ऊँचे और स्पष्ट निशान की जरूरत थी।”
सिकंदर की मृत्यु के बाद मिस्र पर उनके सेनापति टॉलेमी प्रथम (Ptolemy I Soter) का राज हुआ। उन्होंने 305 ईसा पूर्व में खुद को राजा घोषित किया और ऐलेक्जेंड्रिया को अपनी राजधानी बनाया।
टॉलेमी ने इस नगर को दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक और ज्ञान का केंद्र बनाने का सपना देखा। उन्होंने ऐलेक्जेंड्रिया की महान पुस्तकालय (Library of Alexandria) और “म्यूज़ियम” (Mouseion) यानी विद्वानों के शोध केंद्र की स्थापना की।
लेकिन जब तक बंदरगाह सुरक्षित नहीं होगा, व्यापार नहीं होगा। और इसके लिए चाहिए था एक महान रोशनीघर।
फारोस द्वीप: रोशनीघर का वह ठिकाना जिसने एक शब्द को जन्म दिया
रोशनीघर ऐलेक्जेंड्रिया बंदरगाह के पास एक छोटे द्वीप पर बनाया गया जिसका नाम था “फारोस” (Pharos)।
यह द्वीप मुख्य भूमि से एक कृत्रिम तटबंध (Causeway) से जुड़ा था जिसे “हेप्टास्टेडियन” (Heptastadion) कहते थे। यह नाम ग्रीक में “सात स्टेडिया लंबा” बताता है यानी लगभग 1.3 किलोमीटर।
फारोस द्वीप की एक पौराणिक कुख्याति भी थी। किंवदंती थी कि यहाँ के लोग “जहाज तोड़ने वाले” (Wreckers) थे जो रात में जहाजों को भटकाकर चट्टानों से टकरवाते थे और फिर उनका माल लूट लेते थे। टॉलेमी प्रथम ने यही खतरा देखते हुए यहाँ रोशनीघर बनाने की योजना बनाई।
“फारोस” नाम का प्रभाव:
इस द्वीप के नाम ने इतिहास को एक अनमोल उपहार दिया।
रोशनीघर इतना प्रसिद्ध हुआ कि “फारोस” शब्द पहले यूनानी में, फिर लैटिन में और अंततः दर्जनों भाषाओं में “रोशनीघर” का अर्थ बन गया।
आधुनिक ग्रीक में “फारोस (φάρος)” का अर्थ है लाइटहाउस। फ्रेंच में “phare”, इतालवी और स्पेनिश में “faro”, पुर्तगाली में “farol”, बुल्गारियाई में “far”, रोमानियाई में “far” और फ्रेंच, स्पेनिश, तुर्की और रूसी में इससे बने शब्दों का अर्थ “कार की हेडलाइट” तक है।
यानी जब भी कोई फ्रेंच व्यक्ति “phare” कहता है, वह अनजाने में उस 2,300 साल पुराने द्वीप को याद करता है।
सोस्त्रातुस: वह रहस्यमय व्यक्ति जिसने पत्थर पर अपना नाम चुराकर लिखा
ऐलेक्जेंड्रिया के रोशनीघर की सबसे रोचक कहानियों में से एक है उसके शिल्पकार की कहानी।
परंपरागत रूप से “सोस्त्रातुस ऑफ नाइदुस (Sostratus of Cnidus)” को रोशनीघर का वास्तुकार माना जाता है। वे नाइदुस के एक कुशल वास्तुकार, राजनयिक और टॉलेमी दरबार के वरिष्ठ सदस्य थे।
स्ट्राबो ने उन्हें “राजाओं का मित्र” कहा।
हाल के शोधों से पता चला है कि सोस्त्रातुस एक असाधारण प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। उन्होंने नील नदी को बाँधकर टॉलेमी के मिस्र-विजय में मदद की थी। उन्होंने नाइदुस में मेहराबों पर बना एक भव्य रास्ता (causeway) बनाया था। और वे पूरे ग्रीस में टॉलेमी के दूत और राजनयिक थे।
लेकिन सोस्त्रातुस की सबसे प्रसिद्ध कहानी है उस शिलालेख की जो उन्होंने रोशनीघर पर उकेरा।
वह शिलालेख जिसे समय ने उघाड़ा
रोमन लेखक लूकियन (Lucian) ने 166 ईस्वी में एक अत्यंत रोचक कहानी लिखी।
उनके अनुसार सोस्त्रातुस ने रोशनीघर पर जिप्सम की एक परत चढ़ाई जिस पर टॉलेमी प्रथम का नाम लिखा था। यह वह नाम था जो राजा चाहते थे।
लेकिन जिप्सम के नीचे, पत्थर में उन्होंने खुदवाया:
“देवीफेनेस के पुत्र सोस्त्रातुस नाइदिएन ने, समुद्र पर यात्रा करने वालों की रक्षा के लिए, दैवीय रक्षकों को यह समर्पित किया।”
सोस्त्रातुस को पता था कि जिप्सम समय के साथ झड़ जाएगी और समुद्र की नमक-भरी हवाएं उसे मिटा देंगी। लेकिन पत्थर में खुदा नाम हमेशा रहेगा।
लूकियन ने इस कहानी का उपयोग एक बड़े सिद्धांत को समझाने के लिए किया: “इतिहास भी ऐसे ही लिखा जाना चाहिए, वर्तमान की चापलूसी के लिए नहीं, बल्कि भविष्य की नज़र से।”
प्लिनी द एल्डर ने हालाँकि एक अलग कहानी दी। उनके अनुसार टॉलेमी ने खुद उदारता से सोस्त्रातुस को उनका नाम लिखने की अनुमति दी।
सच क्या था, यह आज भी बहस का विषय है। लेकिन दोनों ही कहानियाँ एक सत्य बताती हैं: सोस्त्रातुस का नाम रोशनीघर पर था और इतिहास ने उसे याद रखा।
निर्माण की कहानी: दो पीढ़ियों का एक सपना
रोशनीघर का निर्माण दो टॉलेमी शासकों के शासनकाल में हुआ।
टॉलेमी प्रथम (Ptolemy I Soter) ने लगभग 300 ईसा पूर्व में परियोजना शुरू करवाई। लेकिन वे इसे पूरा होते नहीं देख पाए। 283 ईसा पूर्व में उनकी मृत्यु हो गई।
उनके पुत्र टॉलेमी द्वितीय (Ptolemy II Philadelphus) ने परियोजना जारी रखी और लगभग 280 ईसा पूर्व में रोशनीघर का निर्माण पूरा हुआ।
निर्माण में लगभग 12 से 20 वर्ष लगे। लागत थी 800 टैलेंट चाँदी जो आज के हिसाब से लगभग 21 मिलियन अमेरिकी डॉलर के बराबर होगी।
कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि इसकी लागत पार्थेनन से दोगुनी थी।
वास्तुकला का चमत्कार: तीन मंजिलें, एक अमर संरचना
रोशनीघर की संरचना के बारे में हम जो जानते हैं वह प्राचीन लेखकों के विवरणों, अरबी यात्रियों की रिपोर्टों और रोमन सिक्कों पर उकेरी छवियों से आता है।
इसकी ऊँचाई 100 से 130 मीटर (330 से 430 फीट) के बीच बताई जाती है।
तुलना के लिए: आधुनिक स्टैचू ऑफ लिबर्टी (आधार सहित) 93 मीटर की है।
इसे छोड़कर उस समय दुनिया में केवल गीज़ा के पिरामिड इससे ऊँचे थे।
रोशनीघर की संरचना तीन स्पष्ट खंडों में थी।
पहला खंड: वर्गाकार आधार (Square Base)
सबसे नीचे था एक वर्गाकार (Square) खंड। इसकी नींव 30 मीटर गुणा 30 मीटर की थी। इसकी ऊँचाई लगभग 60 मीटर थी।
इस खंड की दीवारें मोटी और मजबूत थीं। दीवारों में खिड़कियाँ थीं जिनसे रोशनी अंदर आती थी और हवा का आना-जाना भी होता था।
इस खंड के भीतर कर्मचारियों के लिए कमरे, ईंधन भंडारण और जानवरों के अस्तबल थे। जानवरों का उपयोग ईंधन को ऊपर तक पहुँचाने के लिए होता था।
एक रोचक इंजीनियरिंग विशेषता: दीवारों के बीच ईंधन पहुँचाने के लिए आंतरिक रैंप (Ramps) थे जिन पर जानवर या मजदूर ईंधन लादकर चढ़ते थे।
दूसरा खंड: अष्टभुजाकार (Octagonal Section)
पहले खंड के ऊपर था एक अष्टभुजाकार (Octagonal) खंड। इसकी ऊँचाई लगभग 30 मीटर थी।
इसके आठ कोनों वाले आकार का एक व्यावहारिक उद्देश्य था। अष्टभुज आकार तेज समुद्री हवाओं को कम प्रतिरोध देता है। एक वर्गाकार संरचना तेज हवाओं में अधिक दबाव झेलती है जबकि अष्टभुज हवा को अपनी सतहों पर वितरित करता है।
यह एक वायुगतिकीय (Aerodynamic) सोच थी जो 2,300 साल पुरानी थी।
तीसरा खंड: गोलाकार (Cylindrical Section)
सबसे ऊपर था एक गोलाकार (Cylindrical) खंड। इसकी ऊँचाई लगभग 20 मीटर थी।
इस गोलाकार खंड में स्तंभों का एक वृत्त (Colonnade) था। और इसके भीतर था वह अग्निकुंड जो रात भर जलता था।
शीर्ष की विशाल प्रतिमा
रोशनीघर के शीर्ष पर एक 5 से 7 मीटर ऊँची विशाल प्रतिमा थी।
यह प्रतिमा किसकी थी? इस पर प्राचीन स्रोत असहमत हैं। कुछ स्रोत कहते हैं ज़ीउस की, कुछ पोसाइडन (समुद्र के देवता) की, कुछ हेलिओस (सूर्य देवता) की और कुछ स्रोत इसे सिकंदर महान या टॉलेमी प्रथम की मूर्ति बताते हैं।
रोमन सिक्कों पर रोशनीघर की जो छवियाँ हैं उनमें चार छोटी मूर्तियाँ भी इमारत के कोनों पर दिखती हैं। माना जाता है कि ये ट्राइटन (Triton) यानी पोसाइडन के पुत्रों की मूर्तियाँ थीं।
वह “दूसरा सूरज”: रोशनी कैसे फैलाई जाती थी?
रोशनीघर की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी उसकी रोशनी की प्रणाली।
दिन में: शीर्ष पर परावर्तक दर्पण (Reflective Mirror) लगे थे जो काँसे (Bronze) से बने थे। ये दर्पण सूरज की रोशनी को दूर तक परावर्तित करते थे। दिन में जहाज यही परावर्तित रोशनी देखकर दिशा का अनुमान लगाते थे।
रात में: एक विशाल अग्निकुंड जलाया जाता था। इस आग का प्रकाश काँसे के दर्पणों से परावर्तित होकर और बड़े क्षेत्र तक फैलता था।
अरबी स्रोत बताते हैं कि इस रोशनी की पहुँच लगभग 50 किलोमीटर (30 मील) तक थी।
यूनानी लेखक अकिलीस तातियस (Achilles Tatius) ने दूसरी सदी ईस्वी में लिखा: “यह केवल एक ऊँचा दीपस्तंभ नहीं था, यह एक दूसरा सूरज था जो नगर पर चमकता था।”
ईंधन की व्यवस्था: एक जटिल दैनिक कार्य
रोशनीघर के लिए ईंधन की जरूरत निरंतर थी।
ईंधन संभवतः लकड़ी, जैतून का तेल या अन्य दहनशील सामग्री था।
इसे हर दिन सैकड़ों मीटर ऊँचाई तक पहुँचाना एक बड़ा काम था। इसके लिए आंतरिक रैंपों पर जानवरों और मजदूरों की एक सुव्यवस्थित प्रणाली काम करती थी।
कर्मचारी: रोशनीघर पर काम करने के लिए एक स्थायी कर्मचारी दल था जिसमें शामिल थे: आग जलाने और बनाए रखने वाले, दर्पणों की सफाई करने वाले, मौसम पर नज़र रखने वाले और संरचना की मरम्मत करने वाले।
निर्माण में उपयोग हुई सामग्री: तट के किले जैसी मजबूती
रोशनीघर को उत्तरी अफ्रीका के कठोर समुद्री वातावरण के लिए असाधारण रूप से मजबूत बनाया गया था।
चूना पत्थर और बलुआ पत्थर: मूल रूप से “वादी हम्मामात (Wadi Hammamat)” की खदानों से लाया गया। यह खदान ऐलेक्जेंड्रिया से पूर्व में रेगिस्तान में थी।
ग्रेनाइट: विशेष रूप से मजबूत हिस्सों के लिए।
पिघला हुआ शीशा (Molten Lead): एक महत्वपूर्ण नवाचार। पत्थरों के बीच के जोड़ों में पिघला शीशा डाला गया था। जब यह ठंडा होता था तो दो पत्थरों को आपस में इस तरह जोड़ देता था कि समुद्री लहरें उन्हें अलग नहीं कर सकती थीं।
भूकंपरोधी डिज़ाइन: ऐलेक्जेंड्रिया “हेलेनिक आर्क” (Hellenic Arc) के पास है जहाँ अफ्रीकी और यूरेशियाई टेक्टोनिक प्लेटें मिलती हैं। इसलिए भूकंप का खतरा था। शोधकर्ताओं का मानना है कि शीशे का उपयोग भूकंपरोधी “कुशन” के रूप में भी किया गया था।
ऐलेक्जेंड्रिया का वह स्वर्णिम युग जब रोशनीघर चमकता था
रोशनीघर उस ऐलेक्जेंड्रिया का प्रतीक था जो उस युग का ज्ञान और व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र था।
ऐलेक्जेंड्रिया की महान पुस्तकालय (Library of Alexandria): दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञान-भंडार था। 7 लाख से अधिक पांडुलिपियाँ यहाँ संरक्षित थीं। यूक्लिड, आर्किमिडीज़, इरेटोस्थेनेस, हाइपेशिया जैसे महान विद्वान यहाँ काम करते थे।
म्यूज़ियम (Mouseion): पुस्तकालय के साथ ही एक शोध संस्थान था जहाँ गणित, खगोल विज्ञान, दर्शन और साहित्य के विद्वान एकत्र थे।
सेरापेयम मंदिर (Serapeum): एक विशाल मंदिर जो ग्रीक-मिस्री देवता सेरापिस को समर्पित था।
सिकंदर का मकबरा: स्वयं सिकंदर महान की समाधि यहाँ थी।
रोशनीघर इस सबका मुकुट था। जब कोई विद्वान या व्यापारी ऐलेक्जेंड्रिया आता था तो सबसे पहले यही दिखता था।
जूलियस सीज़र (Julius Caesar) ने जब ऐलेक्जेंड्रिया का दौरा किया तो वे रोशनीघर से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने रोम वापस आकर अपनी विजय-शोभायात्रा में रोशनीघर का एक मॉडल प्रदर्शित करवाया। उसमें आग की नकल भी जलाई गई।
स्किपियो अफ्रिकानस (Scipio Africanus) के बारे में एक रोचक कहानी है। जब वे ऐलेक्जेंड्रिया गए तो उन्होंने टॉलेमी के दरबार की भव्यता और ऐश्वर्य को नजरअंदाज किया लेकिन रोशनीघर को “वास्तव में देखने योग्य” बताया।
पोसिदिप्पस का शिलालेख: उद्घाटन की वह कविता
जब रोशनीघर का उद्घाटन हुआ तो टॉलेमी के दरबारी कवि पोसिदिप्पस (Posidippus) ने एक एपिग्राम (Epigram) यानी एक छोटी पर सशक्त कविता लिखी।
इस कविता में उन्होंने देवता प्रोतियस (Proteus) से प्रार्थना की जो फारोस द्वीप के रक्षक माने जाते थे।
पोसिदिप्पस ने लिखा: “हे महान प्रोतियस, यूनानियों के रक्षक… फारोस से, सोस्त्रातुस नाइदिएन के हाथों, यह रोशनी चमकती है।”
यह पहला साहित्यिक साक्ष्य है जो रोशनीघर के पूरा होने की खुशी व्यक्त करता है।
रोशनीघर और अरब दुनिया: 1,000 साल की अरबी गवाही
रोशनीघर के बारे में हमारी सबसे विस्तृत और ठोस जानकारी अरबी यात्रियों और लेखकों के विवरणों से आती है।
इब्न जुबैर की यात्रा (1183 ईस्वी)
अरब यात्री इब्न जुबैर (Ibn Jubayr) ने 1183 ईस्वी में ऐलेक्जेंड्रिया की यात्रा की और रोशनीघर का विस्तृत वर्णन किया।
उन्होंने लिखा: “यह टॉवर वर्णना से परे है। इसे देखने वाली आँखें थक जाती हैं और जो इसे देखता है वह हतप्रभ रह जाता है।”
उनके विवरण में रोशनीघर की तीन मंजिलों का स्पष्ट उल्लेख है।
अल-मसूदी की रिपोर्ट (10वीं सदी)
अरब भूगोलविद और इतिहासकार अल-मसूदी (Al-Masudi) ने 10वीं सदी में लिखा। उनके अनुसार रोशनीघर की शीर्ष पर एक परावर्तक दर्पण था जो इतना शक्तिशाली था कि इससे दुश्मन के जहाज देखे जा सकते थे और उन्हें जलाया भी जा सकता था।
यह कहानी संभवतः अतिरंजित है लेकिन यह बताती है कि अरब लेखकों के मन में रोशनीघर की दर्पण-प्रणाली के बारे में कितनी ऊँची धारणा थी।
इब्न बतूता की अंतिम गवाही (1326 ईस्वी)
महान अरब यात्री इब्न बतूता (Ibn Battuta) ने 1326 ईस्वी में ऐलेक्जेंड्रिया का दौरा किया। उन्होंने रोशनीघर को “आश्चर्यजनक लेकिन आंशिक रूप से खंडहर” के रूप में वर्णित किया।
1349 में जब वे दोबारा आए तो उन्होंने लिखा: “अब टॉवर इतनी बुरी हालत में है कि इसमें प्रवेश करना या ऊपर चढ़ना असंभव है।”
यह उस गिरावट की गवाही है जो बड़े भूकंपों के बाद आई।
भूकंपों की मार: वह प्राकृतिक शक्ति जिसने एक अजूबे को तोड़ा
रोशनीघर का पतन किसी एक घटना से नहीं, बल्कि तीन बड़े भूकंपों की श्रृंखला से हुआ।
956 ईस्वी: पहले बड़े भूकंप ने रोशनीघर को क्षति पहुँचाई। इसके बाद मरम्मत हुई लेकिन रोशनीघर पहले जैसा नहीं रहा।
1303 ईस्वी: एक और भयंकर भूकंप ने “पूर्वी भूमध्यसागर” (Eastern Mediterranean) को हिला दिया। इस भूकंप की तीव्रता 8.0 रिक्टर से अधिक आँकी जाती है। इसमें रोशनीघर को गहरी क्षति हुई।
1323 ईस्वी: अंतिम भूकंप ने शेष बची संरचना को भी गिरा दिया।
इब्न बतूता ने इस अंतिम पतन के लगभग तीन साल बाद ऐलेक्जेंड्रिया का दौरा किया। वे जो देखा उससे दुखी हुए।
कैतबे का किला: जब रोशनीघर के पत्थर एक किले की दीवार बने
1480 ईस्वी में मामलूक सुल्तान अशरफ कैतबे (Mamluk Sultan Qaitbay) ने उसी स्थान पर जहाँ रोशनीघर खड़ा था, एक समुद्री किला (Citadel of Qaitbay) बनाया।
इस किले के निर्माण में रोशनीघर के बचे-खुचे पत्थरों का उपयोग किया गया। यह वही स्थान था जहाँ 1,760 साल पहले एक महान अजूबे की नींव रखी गई थी।
कैतबे का किला आज भी खड़ा है और ऐलेक्जेंड्रिया का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है।
कभी-कभी इतिहास इस तरह चक्र पूरा करता है। जो पत्थर हजारों नाविकों को घर की राह दिखाते थे, वे आखिरकार एक किले की दीवार में समा गए जो उन्हें दुश्मनों से बचाती थी।
1994 की अद्भुत खोज: समुद्र की गहराई में इतिहास
1994 में फ्रांसीसी पुरातत्वविद जाँ-इव एम्परर (Jean-Yves Empereur) के नेतृत्व में एक टीम ने ऐलेक्जेंड्रिया के पूर्वी बंदरगाह में गोताखोरी की।
जो मिला वह इतिहासकारों के लिए एक बड़ी खोज थी।
समुद्र की गहराई में रोशनीघर के विशाल पत्थर के खंड मिले। इनमें शामिल थे: स्फिंक्स की आकृतियाँ, विशाल स्तंभ, मूर्तियों के टुकड़े और इमारत के बड़े हिस्से।
ये पत्थर उस समय से वहाँ थे जब भूकंपों ने रोशनीघर को समुद्र में धकेल दिया था।
2016 में एक और अभियान में कैतबे किले के पास और अधिक पत्थर मिले।
आज भी ऐलेक्जेंड्रिया बंदरगाह की गहराई में रोशनीघर की नींव के अवशेष सोए हुए हैं।
रोशनीघर की विरासत: जब एक इमारत ने दुनिया को बदला
ऐलेक्जेंड्रिया के रोशनीघर की विरासत असाधारण रूप से विस्तृत है।
भाषाई विरासत
जैसा पहले बताया, “फारोस” नाम से दुनिया की दर्जनों भाषाओं में “रोशनीघर” और “हेडलाइट” जैसे शब्द बने।
वास्तुशिल्प विरासत
रोशनीघर ने लाइटहाउस आर्किटेक्चर को जन्म दिया। बाद के सभी रोशनीघरों में इसी की तीन-मंजिला संरचना की झलक मिलती है।
रोमन साम्राज्य ने ओस्टिया (Ostia) और अन्य बंदरगाहों में ऐलेक्जेंड्रिया के मॉडल पर रोशनीघर बनाए।
कुछ इतिहासकार मानते हैं कि अरब मीनार (Minaret) की वास्तुकला भी आंशिक रूप से फारोस से प्रेरित थी। ऊँचाई, तीन-खंड संरचना और शीर्ष पर एक विशेष तत्व की यह परंपरा मीनार में भी दिखती है।
सांस्कृतिक विरासत
नेपच्यून के चाँद “प्रोतियस” पर एक बड़े गड्ढे का नाम “फारोस” रखा गया है।
ऐलेक्जेंड्रिया के राज्यपाल के झंडे पर रोशनीघर का चित्र अंकित है।
मिस्र की नौसेना के प्रतीक में भी रोशनीघर है।
वह रहस्यमय दर्पण: क्या रोशनीघर एक हथियार भी था?
अरबी स्रोतों में एक रोचक किंवदंती है।
कुछ अरब लेखकों ने दावा किया कि रोशनीघर के शीर्ष पर लगा परावर्तक दर्पण इतना शक्तिशाली था कि वह दुश्मन के जहाजों को जलाने में सक्षम था।
यह दावा कि एक दर्पण से समुद्र में कई किलोमीटर दूर जहाज जलाए जा सकते हैं, भौतिकी की दृष्टि से अतिरंजित है।
लेकिन यह संभव है कि दर्पण इतना शक्तिशाली था कि वह अचानक तीव्र रोशनी से दुश्मन नाविकों की आँखें चौंधिया देता था जिससे जहाजें दिशा भटक जाती थीं।
यह सैन्य उपयोग प्रमाणित नहीं है लेकिन यह उस दर्पण की असाधारण शक्ति की अरबी कल्पना को दर्शाता है।
रोशनीघर के रोचक तथ्य
यह प्राचीन विश्व के सात अजूबों में सबसे लंबे समय तक खड़ा रहने वाला अजूबा था, 1,600 से अधिक वर्षों तक। इसकी रोशनी 50 किलोमीटर से अधिक दूर तक दिखती थी। “फारोस” शब्द से दुनिया की दर्जनों भाषाओं में “रोशनीघर” का शब्द बना। इसकी ऊँचाई गीज़ा के पिरामिड के बाद दुनिया में दूसरी सबसे ऊँची मानव-निर्मित संरचना थी। इसे बनाने में लगभग 800 टैलेंट चाँदी खर्च हुई। सोस्त्रातुस ने राजा के नाम के नीचे छुपाकर अपना नाम पत्थर में उकेरा। जूलियस सीज़र ने अपनी रोमन शोभायात्रा में इसका मॉडल प्रदर्शित करवाया। तीन बड़े भूकंपों से नष्ट होकर इसके अवशेष कैतबे किले में समा गए। 1994 में समुद्र की गहराई में इसके पत्थर मिले। यह प्राचीन विश्व का पहला सच्चा रोशनीघर था जिसने आधुनिक लाइटहाउस की नींव रखी।
आज का ऐलेक्जेंड्रिया और रोशनीघर का स्थान
आज ऐलेक्जेंड्रिया मिस्र का दूसरा सबसे बड़ा शहर है जिसकी आबादी लगभग 50 लाख है।
जहाँ कभी रोशनीघर खड़ा था, वहाँ आज कैतबे का किला (Citadel of Qaitbay) है जो 1480 ईस्वी में बना था। यह आज एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है।
2015 में मिस्र सरकार ने रोशनीघर के स्थान पर एक आधुनिक ऊँची इमारत बनाने का प्रस्ताव दिया था लेकिन इतिहासकारों और संरक्षणविदों के विरोध के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ी।
1978 से इस स्थल पर एक आधुनिक रोशनीघर बनाने के कई प्रस्ताव आए हैं लेकिन कोई भी साकार नहीं हुआ।
ऐलेक्जेंड्रिया की नई पुस्तकालय (Bibliotheca Alexandrina) 2002 में बनी जो प्राचीन पुस्तकालय की याद में समर्पित है। यह आज एक बड़ा सांस्कृतिक केंद्र है।
ऐलेक्जेंड्रिया कैसे पहुँचें?
हवाई मार्ग: ऐलेक्जेंड्रिया बोर्ग अल-अरब हवाई अड्डा (Borg Al Arab Airport) शहर से लगभग 45 किलोमीटर दूर है। काहिरा से लगभग 45 मिनट की उड़ान।
रेल मार्ग: काहिरा से ऐलेक्जेंड्रिया तक 2.5 से 3 घंटे की ट्रेन यात्रा। यह सबसे सुविधाजनक और खूबसूरत मार्ग है।
मुख्य आकर्षण: कैतबे का किला, बिबलियोथेका ऐलेक्जेंड्रिना (नई पुस्तकालय), ग्रेको-रोमन संग्रहालय, कोम अल-शुकाफा के कब्रिस्तान और ऐलेक्जेंड्रिया का मछली बाज़ार।
निष्कर्ष: जब एक रोशनी ने इतिहास को रोशन किया
ऐलेक्जेंड्रिया का रोशनीघर प्राचीन विश्व के सात अजूबों में सबसे विशेष था।
बाकी अजूबे देवताओं की पूजा, राजाओं की महत्वाकांक्षा, मृत्यु के बाद की आस्था या किसी देश की विजय-गाथा के लिए बने थे। लेकिन यह रोशनीघर बना था एक साधारण उद्देश्य के लिए: हर रात, हर तूफान में, हर अँधेरे में, इंसानों को घर का रास्ता दिखाना।
यह 1,600 से अधिक वर्षों तक यही काम करता रहा।
सोस्त्रातुस ने जो नाम पत्थर में छुपाकर लिखा था, वह आज दुनिया जानती है। टॉलेमी का नाम जो जिप्सम पर था, वह झड़ गया। लेकिन उस रोशनीघर की याद न झड़ी, न झड़ेगी।
जब भी कोई नाविक आज एक आधुनिक रोशनीघर की रोशनी में अपना रास्ता खोजता है, जब भी कोई गाड़ी की हेडलाइट जलाता है, जब भी फ्रेंच में “phare” या इतालवी में “faro” बोला जाता है, तब उस ऐलेक्जेंड्रिया के फारोस की आत्मा एक पल के लिए जाग उठती है।
क्योंकि सबसे बड़ी अमरता वही होती है जब आपके काम का असर आपसे हजारों साल बाद भी महसूस किया जाए।
और इस रोशनीघर का असर आज भी, हर रात, दुनिया के हर समुद्री तट पर महसूस होता है।
“यह केवल एक ऊँचा दीपस्तंभ नहीं था, यह एक दूसरा सूरज था जो नगर पर चमकता था, समुद्री यात्रियों का मार्गदर्शक और एक साम्राज्य की शक्ति का अमर प्रतीक।” “It was not merely a lofty lantern, but a second sun that shone over the city.” — अकिलीस तातियस (Achilles Tatius), दूसरी सदी ईस्वी
संदर्भ स्रोत: Wikipedia, World History Encyclopedia, Britannica, TheCollector, The Past (History Magazine), History Skills, Study.com, Memphis Tours, University of Chicago Encyclopaedia Romana, National Geographic